बता दें कि यह डील भारतीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित की गई थी. बाद में जारी जॉइंट स्टेटमेंस में और व्हाइट हाउस की फैक्टशीट में टैरिफ, कृषि उत्पादों, ऊर्जा की खरीद और डिजिटल ट्रेड से जुड़े कई दावे किए गए. लेकिन हाल में व्हाइट हाउस ने अपनी फैक्टशीट में कुछ अहम संशोधन किए हैं. इन बदलावों में दालों को पूरी तरह सुरक्षित रखना, 500 अरब डॉलर की खरीद को केवल “इरादा” बताना, डिजिटल सेवा कर हटाने का जिक्र हटाना और समझौते को “अंतरिम” कहना शामिल है. भारतीय दालें संरक्षित रहेंगी, और यह भी जरूरी नहीं कि 500 अरब डॉलर का आयात भारत द्वारा किया ही जाएगा. ये खबरें अब तक आप पढ़ और सुन चुके होंगे. लेकिन इसी संशोधित फैक्टशीट में और क्या-क्या चीजें बदली गई हैं, चलिए एक-एक करके सब बताते हैं.
दालों को लेकर क्या बदलाव हुआ?
पहले अमेरिका की ओर से कहा गया था कि भारत कुछ अमेरिकी कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करेगा, जिसमें दालें भी शामिल थीं. लेकिन संशोधित फैक्टशीट में दालों का नाम हटा दिया गया है.
भारत ने अपने एग्रीकल्चर चैप्टर में साफ किया है कि दालें एक संवेदनशील क्षेत्र हैं और इन्हें पूरी तरह संरक्षण दिया गया है. इसका मतलब है कि भारतीय किसानों को अमेरिकी दालों के साथ सीधे कंपीटिशन का खतरा नहीं होगा. दालों की खेती लाखों किसानों की आय से जुड़ी है, इसलिए यह बदलाव उनके लिए राहत की खबर है.
500 अरब डॉलर की खरीद पर भाषा क्यों बदली?
पहले कहा गया था कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर से ज्यादा के उत्पाद खरीदेगा. अब कहा गया है कि भारत ऐसा करने का “इरादा” रखता है. सरल शब्दों में समझें तो पहले यह एक पक्का वादा जैसा लग रहा था, अब यह एक संभावित योजना जैसा है. इससे भारत पर कानूनी या औपचारिक दबाव कम हो गया है. यह खरीद ऊर्जा, विमान, कीमती धातुओं, तकनीकी सामान और कोयले जैसे क्षेत्रों से जुड़ी बताई गई है.
डिजिटल सर्विस टैक्स (DST) का क्या मामला है?
पहले अमेरिका की फैक्टशीट में लिखा गया था कि भारत अपना डिजिटल सर्विस टैक्स हटा देगा. लेकिन अब यह लाइन हटा दी गई है. अब केवल इतना कहा गया है कि दोनों देश डिजिटल व्यापार के नियमों पर बातचीत करेंगे. इसका मतलब है कि भारत ने अपनी टैक्स पॉलिसी पर नियंत्रण बनाए रखा है और किसी दबाव में सीधा फैसला नहीं किया.
डिजिटल सर्विस टैक्स को भारत में आमतौर पर “इक्वलाइजेशन लेवी” कहा जाता है. यह एक ऐसा टैक्स है, जो विदेशी डिजिटल कंपनियों से वसूला जाता है. खासकर उन कंपनियों से जो भारत में बड़ा कारोबार करती हैं, लेकिन यहां उनकी कोई स्थायी शाखा या दफ्तर नहीं होता. भारत ने 2016 में पहली बार डिजिटल सेवाओं पर टैक्स लगाया था. फिर 2020 में इसे और व्यापक बनाया गया.
अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, यह एक भेदभावपूर्ण व्यवस्था है. इसी वजह से भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर हुई वार्ताओं में DST एक अहम मुद्दा बना रहा. संशोधित फैक्टशीट में यह दावा हटा दिया गया है कि भारत इसे टैक्स को तुरंत हटा देगा. इसका मतलब है कि इस विषय पर बातचीत जारी है, लेकिन कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है.
’अंतरिम समझौता’ का क्या अर्थ?
7 फरवरी को जारी संयुक्त बयान में इस समझौते को ‘अंतरिम समझौता’ कहा गया है. इसका मतलब है कि यह फाइनल और व्यापक समझौता नहीं है. दोनों देश एक बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर अभी भी बातचीत कर रहे हैं. यानी मौजूदा समझौता एक शुरुआत है, आगे और भी बदलाव होने की संभावनाएं हैं.
टैरिफ में क्या राहत मिली?
अमेरिका ने भारत पर लगाया गया 25% रेसिप्रोकल टैक्स घटाकर 18% कर दिया है. इसके अलावा रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर लगाया गया अतिरिक्त 25% शुल्क भी हटा दिया गया है. इससे भारतीय निर्यातकों को राहत मिल सकती है और दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा मिलेगा.
कृषि में टैरिफ कम होंगे क्या?
भारत ने खेती और खाने-पीने की चीजें बनाने वाले उद्योग से जुड़े कुछ सामानों पर आयात शुल्क तुरंत खत्म नहीं किया है. सरकार ने फैसला किया है कि इन पर लगने वाला टैक्स एकदम से नहीं हटेगा, बल्कि करीब 10 साल में धीरे-धीरे कम किया जाएगा. इनमें नारियल तेल, अरंडी का तेल, कपास बीज का तेल, संशोधित स्टार्च जैसे कच्चे माल शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल खाद्य कंपनियां करती हैं.
सरकार का मानना है कि अगर अचानक सस्ता विदेशी सामान बाजार में आ गया तो देश की कंपनियों को नुकसान हो सकता है. इसलिए उन्हें समय दिया जा रहा है ताकि वे अपनी लागत घटाएं, तकनीक सुधारें और प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो सकें.
सरकार इस समझौते को कैसे देख रही है?
सरकार का कहना है कि यह समझौता फार्मर-फर्स्ट है, मतलब सबसे पहले किसानों के हितों को ध्यान में रखकर किया गया है. खेती, डेयरी और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों को किसी भी तरह के नुकसान से बचाने की कोशिश की गई है. इन क्षेत्रों पर अचानक दबाव न पड़े, इसलिए सुरक्षा उपाय रखे गए हैं. सरकार का दावा है कि देश के किसानों और छोटे उत्पादकों की आय पर इसका नकारात्मक असर नहीं होगा. साथ ही, जिन उद्योगों में ज्यादा मजदूर काम करते हैं, जैसे कपड़ा, चमड़ा और अन्य श्रम-प्रधान क्षेत्र, उन्हें नए निर्यात अवसर मिल सकते हैं. इससे रोजगार बढ़ने और आर्थिक गतिविधि तेज होने की उम्मीद जताई जा रही है.
संशोधित फैक्टशीट से यह स्पष्ट होता है कि भारत ने बातचीत में अपने हितों को प्राथमिकता दी है. दालों की सुरक्षा, 500 अरब डॉलर की खरीद पर नरमी, डिजिटल कर हटाने के दावे को हटवाना और समझौते को अंतरिम बताना, ये सभी संकेत देते हैं कि भारत ने संतुलित और रणनीतिक रुख अपनाया.
Discover more from Business News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.