6 फरवरी को जारी इस संयुक्त बयान में कहा गया है कि भारत अमेरिका के खाद्य और कृषि उत्पादों से जुड़ी गैर-शुल्कीय बाधाओं को संबोधित करेगा. लेकिन समस्या यह है कि इन बाधाओं के नेचर को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है. इसी अस्पष्टता ने आशंकाओं को जन्म दिया है. कई जानकारों का मानना है कि अमेरिका लंबे समय से भारत के उस रुख का विरोध करता रहा है, जिसमें जेनेटिकली मॉडिफाइड यानी GM उत्पादों के आयात की इजाजत नहीं दी जाती.
क्या है चिंता की बात
मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट के कार्यकारी अध्यक्ष बिस्वजीत धर का कहना है कि अमेरिका की नजर में भारत द्वारा जीएम उत्पादों को न अपनाना एक बड़ा नॉन-टैरिफ बैरियर है. उनके मुताबिक, संयुक्त बयान में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्या इस मुद्दे पर भारत का रुख बदला है या नहीं. यही बात चिंता का कारण है.
वहीं, स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक अश्विनी महाजन का कहना है कि नॉन-टैरिफ बैरियर्स का होना कोई असामान्य बात नहीं है. उनके अनुसार, अमेरिका में करीब 6500 नॉन-टैरिफ बैरियर हैं, जबकि भारत में इनकी संख्या लगभग 350 है. हालांकि उन्होंने साफ तौर पर कहा कि कृषि क्षेत्र में किसी भी तरह की ढील बेहद सोच-समझकर दी जानी चाहिए. उनका कहना है कि किसी भी सूरत में जीएम प्रोडक्ट्स को इसमें शामिल नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि अमेरिकी किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है और भारतीय किसान उस स्तर की प्रतिस्पर्धा झेलने की स्थिति में नहीं हैं. सरकार की जिम्मेदारी है कि वह घरेलू किसानों की सुरक्षा सुनिश्चित करे.
इस बीच वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल यह साफ कर चुके हैं कि भारत जीएम खाद्य उत्पादों के आयात की अनुमति नहीं दे रहा है. लेकिन इसके बावजूद आशंकाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं.
अमेरिका की पॉलिसी पर संदेह
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का मानना है कि नॉन-टैरिफ बैरियर्स को लेकर भारत की सहमति अमेरिका के अन्य व्यापार समझौतों जैसी हो सकती है. उन्होंने मलेशिया के साथ हुए अमेरिकी समझौते का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अमेरिकी स्वच्छता और स्वास्थ्य प्रमाणन को घरेलू मानकों से ऊपर रखा गया. अगर भारत से भी ऐसी ही एकतरफा रियायत मांगी गई तो यह चिंता का विषय होगा.
संयुक्त बयान में टैरिफ को लेकर भी अहम बातें कही गई हैं. इसमें बताया गया है कि भारत ने कुछ खाद्य उत्पादों पर शुल्क में कटौती की पेशकश की है. इनमें ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स यानी डीडीजी, ड्राय फ्रूट्स, ताजा और प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स शामिल हैं. अजय श्रीवास्तव का कहना है कि सेब, संतरा और सोयाबीन तेल जैसे उत्पादों पर टैरिफ घटाने से भारतीय किसानों को नुकसान हो सकता है. साथ ही यह भी साफ नहीं है कि इन उत्पादों के अलावा और किन कृषि वस्तुओं को इस दायरे में लाया जाएगा.
डील में भारत को असली फायदा कहां?
हालांकि अश्विनी महाजन का तर्क है कि अगर कृषि आयात में टैरिफ रेट कोटा का इस्तेमाल किया गया तो घरेलू जरूरतों का आकलन कर स्थानीय उत्पादकों को नुकसान से बचाया जा सकता है.
प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी का मानना है कि इस पूरे व्यापार ढांचे को संतुलित नजरिए से देखा जाना चाहिए. उनके अनुसार, भारत को असली फायदा कृषि से बाहर के क्षेत्रों में मिलेगा. उन्होंने कहा कि अमेरिका द्वारा कपड़ा, परिधान, चमड़ा, रत्न और आभूषण जैसे श्रम आधारित निर्यात पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती भारत के लिए सबसे बड़ा लाभ है.
कृषि क्षेत्र को लेकर गुलाटी का कहना है कि यहां दी गई रियायतें सीमित हैं. डीडीजी के जरिए मुख्य रूप से पशु आहार बाजार तक पहुंच दी गई है. इसके अलावा कुछ प्रीमियम उत्पाद जैसे ड्राय फ्रूट्स, बेरी, वाइन और स्पिरिट्स शामिल हैं. इससे किसानों पर बड़ा नकारात्मक असर पड़ने की संभावना कम है. उन्होंने यह भी बताया कि डेयरी, मक्का, सोयामील, चीनी, मोटे अनाज, चावल, गेहूं और अन्य जरूरी खाद्य पदार्थों पर कोई रियायत नहीं दी गई है.
डीडीजी और सोयाबीन तेल को लेकर विशेषज्ञों की राय है कि इनका असर सीमित रहेगा. भारत पहले से ही खाद्य तेलों का बड़ा आयातक है और अमेरिका समेत कई देशों से सोयाबीन तेल खरीदता रहा है.
इसके बावजूद किसान संगठनों ने अंतरिम व्यापार ढांचे में कृषि और खाद्य उत्पादों को लेकर चिंता जताई है. उनका कहना है कि भले ही मुख्य फसलें सुरक्षित हों, लेकिन सेब और सोयाबीन तेल जैसे उत्पादों पर शुल्क घटने से घरेलू उत्पादकों को नुकसान हो सकता है. हालांकि अश्विनी महाजन का कहना है कि अमेरिका से आने वाले सेब न्यूनतम 80 रुपये प्रति किलो की कीमत पर आयात होंगे और खुदरा बाजार में इनकी कीमत करीब 200 रुपये प्रति किलो होगी, जिससे घरेलू सेब उत्पादकों पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ेगा.
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