आज दोनों देश कट्टर दुश्मन के रूप में आमने-सामने खड़े हैं, लेकिन इतिहास का यह अध्याय याद दिलाता है कि कभी तेल की जरूरत ने उन्हें एक ही मेज पर बैठने के लिए मजबूर कर दिया था. दोनों देश तेल के कारोबार में सीक्रेट पार्टनर बन गए थे. यह कहानी उस दौर की है, जब राजनीतिक दुश्मनी पर आर्थिक जरूरतें ज्यादा भारी पड़ गई थीं.
स्वेज नहर बंद हुई तो बदलना पड़ा रास्ता
उसी समय, जून 1967 में एक युद्ध हुआ. यह युद्ध इज़राइल बनाम तीन प्रमुख अरब देशों के बीच हुआ. तीन देशों में मिस्र (Egypt), जॉर्डन (Jordan) और सीरिया (Syria) शामिल थे. इस संघर्ष में अन्य अरब देशों जैसे इराक (Iraq), सऊदी अरब (Saudi Arabia) और कुछ अन्य देशों ने भी सैन्य या लॉजिस्टिक समर्थन दिया था.
युद्ध की शुरुआत तब हुई जब इज़राइल ने मिस्र के हवाई ठिकानों पर अचानक हमला कर दिया. इसके बाद लड़ाई तेजी से फैल गई और सिर्फ छह दिनों में इज़राइल ने सिनाई प्रायद्वीप, गाजा पट्टी, पश्चिमी तट (West Bank), पूर्वी यरूशलम और गोलान हाइट्स जैसे महत्वपूर्ण इलाकों पर कब्जा कर लिया.
इस युद्ध के बाद मिस्र ने स्वेज नहर (Suez Canal) को बंद कर दिया. मिस्र ने नहर में जहाज़ डुबोकर और बारूदी सुरंगें बिछाकर इसे पूरी तरह बंद कर दिया, ताकि इज़राइली जहाज़ या उसके सहयोगी इस रास्ते का इस्तेमाल न कर सकें.
स्वेज कनाल वही समुद्री रास्ता है, जो यूरोप और एशिया के बीच सबसे छोटा मार्ग माना जाता है. दुनिया के लगभग 12 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और करीब 30 प्रतिशत कंटेनर यातायात इसी नहर से होकर गुजरता है.
इज़राइल के सामने पैदा हुआ तेल का संकट
नहर बंद होने से इज़राइल के सामने तेल आयात का संकट खड़ा हो गया. दूसरी ओर ईरान जैसे तेल निर्यातक देशों को भी यूरोप तक तेल पहुंचाने के लिए वैकल्पिक रास्ते की जरूरत थी, क्योंकि स्वेज नहर 1975 तक बंद रही.
यही परिस्थिति दोनों देशों को एक साथ ले आई. 1968 में एक सीक्रेट जॉइंट वेंचर बनाया गया, जिसके तहत लाल सागर (Red Sea) के बंदरगाह इलात और भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) के बंदरगाह अश्केलोन को जोड़ने के लिए पाइपलाइन बनाई गई.
इस साझेदारी को दुनिया से छिपाने के लिए दोनों देशों ने अलग-अलग विदेशी कंपनियों का सहारा लिया. ईरान की हिस्सेदारी लिकटेंस्टाइन में रजिस्टर्ड कंपनी के माध्यम से थी, जबकि इज़राइल ने पनामा में स्थित एक कंपनी के जरिए अपनी भागीदारी छिपाई.
254 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन
यह परियोजना छोटी नहीं थी. इलात-अश्केलोन पाइपलाइन लगभग 254 किलोमीटर लंबी और 42 इंच चौड़ी थी. इसके जरिए तेल लाल सागर से भूमध्य सागर तक पहुंचाया जाता था. हालांकि इतनी बड़ी परियोजना दुनिया की नजरों से ज्यादा समय तक छिपी नहीं रह सकी. अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA की 25 अप्रैल 1968 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि इस पाइपलाइन के लिए बड़े पैमाने पर तेल का स्रोत ईरान ही होगा.
रिपोर्ट के अनुसार, विशाल सुपरटैंकर इलात के गहरे समुद्री बंदरगाह पर तेल उतारते थे. इसके बाद छोटे टैंकर अश्केलोन से तेल लेकर यूरोप के बाजारों तक पहुंचाते थे. यह रास्ता अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के लंबे समुद्री मार्ग या स्वेज नहर से होकर जाने की तुलना में सस्ता और तेज माना गया.
गुप्त तरीके से होती थी तेल की आपूर्ति
- तेल के इस पूरे कारोबार को बेहद गोपनीय रखा गया था. कई खरीदार सीधे इज़राइल से जुड़ी कंपनी से तेल खरीदने से डरते थे, क्योंकि इससे अरब देशों की नाराज़गी झेलनी पड़ सकती थी.
- पत्रकार जेवियर ब्लास (Javier Blas) और जैक फार्ची (Jack Farchy) ने अपनी मशहूर किताब ‘द वर्ल्ड फॉर सेल’ में इस लुका-छिपी का बेहद दिलचस्प खाका खींचा है.
- फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल टैंकर बंदरगाह के अधिकारियों से सरेआम झूठ बोलते थे कि वे
- ‘जिब्राल्टर’ जा रहे हैं. लेकिन समंदर के बीचों-बीच वे अपना रास्ता बदलते, चुपचाप इज़राइल के इलात बंदरगाह पहुंचते, तेल उतारते और खाली जहाज़ लेकर वापस ईरान लौट जाते.
- इज़राइल ने भी अश्केलोन से यूरोप जाने वाले तेल पर इतनी सख्त सेंसरशिप लगा रखी थी कि किसी भी जहाज़ या कार्गो की जानकारी कभी सार्वजनिक ही नहीं होने दी गई. इस सबके चलते पूरा कारोबार परछाइयों में चलता रहा.
1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई और शाह शासन का अंत हो गया. नई सरकार के आने के बाद ईरान और इज़राइल के रिश्ते पूरी तरह टूट गए. इसी के साथ यह सीक्रेट साझेदारी भी समाप्त हो गई. इज़राइल ने पाइपलाइन परियोजना का राष्ट्रीयकरण कर लिया और उस पर पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया.
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