पीटर नवारो का यह बयान वास्तविकता से कोसों दूर है. हकीकत यह है कि अमेरिकी कंपनियां (जैसे OpenAI, Google और Microsoft) अगर भारत में अपनी सेवाएं दे रही हैं, तो वे इसे परोपकार के लिए नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए कर रही हैं. यहां हम उन मुख्य कारणों और फायदों पर प्रकाश डालते हैं, जो शायद पीटर नवारो ने जान-बूझकर नजरअंदाज कर दिए-
1. दुनिया का सबसे बड़ा डेटा और यूजर बेस
AI मॉडल की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे कितना अधिक और बड़ा डेटा मिलता है. भारत में 140 करोड़ लोग हैं, जो दर्जनों भाषाओं और बोलियों का इस्तेमाल करते हैं. इस विशाल डेटासेट पर अपनी AI को ‘ट्रेन’ करने से अमेरिकी कंपनियां अपने मॉडल्स को अधिक सटीक और ग्लोबल बना पा रही हैं.
लाखों भारतीय यूजर्स जब ChatGPT जैसे टूल्स का उपयोग करते हैं, तो वे अनजाने में उस AI को बेहतर बनाने के लिए फीडबैक (RLHF – Reinforcement Learning from Human Feedback) दे रहे होते हैं. इससे AI की क्वालिटी बढ़ती है, जिसका फायदा अंततः उन अमेरिकी कंपनियों को ही होता है.
2. विशाल रेवेन्यू और पेमेंट करने वाले ग्राहक
यह कहना गलत है कि यह सेवा मुफ़्त है. भारत में लाखों लोग ChatGPT Plus, Claude Pro और Gemini Advanced के लिए मासिक शुल्क चुकाते हैं, और वह भी डॉलर में. भारत की दिग्गज IT कंपनियां (जैसे TCS, Infosys, Wipro) अमेरिकी AI कंपनियों के API का उपयोग करने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च कर रही हैं. भारतीय स्टार्टअप ईकोसिस्टम अमेरिकी क्लाउड (Azure, AWS, Google Cloud) का सबसे बड़ा खरीदार है. ये बात हवा-हवाई नहीं है, चलिए आपको आकड़ों में भी बताते हैं कि हकीकत क्या है-
ChatGPT के कुल वैश्विक ट्रैफिक में भारत की हिस्सेदारी लगभग 9% है, जो अमेरिका के बाद दुनिया में दूसरे नंबर पर है. इसमें लाखों ChatGPT Plus ग्राहक शामिल हैं जो हर महीने 20 डॉलर (लगभग ₹1,650) का भुगतान कर रहे हैं.
अमेरिकी क्लाउड और AI दिग्गज भारत की क्षमता को समझते हैं. यही कारण है कि Microsoft, Google और Amazon ने मिलकर भारत के AI और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर में $67 बिलियन (लगभग ₹5.5 लाख करोड़) से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है. अकेले Microsoft ने भारत में AI के विस्तार के लिए $17.5 बिलियन का निवेश करने का ऐलान किया है.
भारत की दिग्गज IT कंपनियां अमेरिकी AI मॉडल्स (जैसे GPT-4) के API का उपयोग करने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च कर रही हैं. उदाहरण के लिए, TCS ने अपने 1 लाख से अधिक कर्मचारियों को और Infosys ने 2.7 लाख से अधिक कर्मचारियों को इन अमेरिकी AI तकनीकों पर प्रशिक्षित करने के लिए भारी निवेश किया है, जिसका सीधा राजस्व (Revenue) अमेरिकी कंपनियों को मिलता है. भारत का ‘जनरेटिव AI’ मार्केट 2025 तक $7.3 बिलियन (लगभग ₹60,000 करोड़) तक पहुंचने का अनुमान है. अमेरिकी कंपनियां इस विशाल बाजार के सबसे बड़े हिस्से पर कब्जा जमाए बैठी हैं.
3. चीन के खिलाफ ‘सॉफ्ट पावर’ और प्रभुत्व
अगर अमेरिकी कंपनियां भारत से बाहर रहती हैं, तो वह खालीपन (vacuum) तुरंत चीनी AI कंपनियों (जैसे Baidu, Alibaba) द्वारा भर दिया जाएगा. भारत में अपनी मौजूदगी बनाए रखकर अमेरिकी कंपनियां यह सुनिश्चित कर रही हैं कि भविष्य की तकनीक पर अमेरिका का एकाधिकार (Monopoly) बना रहे. यह एक भू-राजनीतिक (Geopolitical) जीत है, जहां पूरी दुनिया का डिजिटल ढांचा अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हो जाता है.
4. भारतीय IT टैलेंट का फायदा
भारत में दुनिया के सबसे अधिक सॉफ्टवेयर डेवलपर्स हैं. जब ये डेवलपर्स अमेरिकी AI मॉडल्स (जैसे GPT-4 या Llama) पर अपने ऐप और सॉफ़्टवेयर बनाते हैं, तो वे असल में अमेरिकी तकनीक के ईकोसिस्टम को मजबूत कर रहे होते हैं. इससे पूरी दुनिया में अमेरिकी स्टैंडर्ड्स सेट हो जाते हैं.
5. इकोनॉमी ऑफ स्केल (Economy of Scale)
सॉफ्टवेयर और AI की दुनिया में, आप जितना अधिक स्केल करते हैं, प्रति यूजर लागत उतनी ही कम होती जाती है. अगर कोई मॉडल सिर्फ अमेरिका के लिए बनेगा, तो उसकी लागत बहुत अधिक होगी. जब वही मॉडल भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में अरबों लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है, तो रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) का खर्च कई गुना बढ़कर वसूल हो जाता है.
नवारो ने और क्या-क्या कहा?
व्हाइट हाउस के ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने यह बात पूर्व व्हाइट हाउस चीफ स्ट्रेटजिस्ट स्टीव बैनन के साथ ‘रियल अमेरिका वॉयस’ चैनल पर दिए गए एक इंटरव्यू में कही. नवारो ने कहा, “अमेरिकी लोग भारत में एआई के लिए पैसे क्यों दे रहे हैं? ChatGPT अमेरिका की जमीन पर चलता है, अमेरिकी बिजली का इस्तेमाल करता है और भारत, चीन तथा दुनिया के अन्य हिस्सों में बड़ी संख्या में यूज़र्स को सेवा देता है.” उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया है.
इसके अलावा नवारो ने खेती की जमीन को लेकर भी चिंता जाहिर की. उन्होंने दावा किया कि विदेशी कंपनियां और लोग अमेरिका में कृषि भूमि असली कीमत से करीब दस गुना ज्यादा दाम पर खरीद रहे हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि इससे अमेरिका में खाने-पीने की चीजों की महंगाई और बढ़ सकती है. नवारो का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर तनाव बना हुआ है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की है. साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर भी अभी तक कोई सहमति नहीं बन पाई है.
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