लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे एक अनदेखी कहानी भी है, कहानी बिजली और पानी की. इन डेटा सेंटरों को चलाने के लिए बिजली चाहिए और कूलिंग के लिए पानी. बिजली और पानी इतना ज्यादा चाहिए कि आप सोच भी नहीं सकते. एक बड़े डेटा सेंटर को लाखों घरों के बराबर बिजली हर दिन चाहिए होती है. इसी तरह लाखों लीटर पानी भी चाहिए. इसकी डिटेल और कैलकुनेशन हमने आगे दी है.
अब सवाल है कि क्या भारत के लिए पास इतना बिजली-पानी है कि वह डेटा सेंटरों की प्यास बुझा पाए? इसका सीधा जवाब है- नहीं. तो फिर आने वाला समय कैसा रहने वाला है? क्या यह तरक्की भारत के लोगों को प्यासा मार देगी? चलिए इसकी परतें उतारते हैं और देखने की कोशिश करते हैं कि उस स्थिति से कैसे निपटा जा सकता है?
कितनी बिजली खाते हैं डेटा सेंटर?
डेटा सेंटर्स चौबीसों घंटे चलते हैं. उनकी कुल बिजली खपत अभी राष्ट्रीय खपत का लगभग 0.5 से 0.8 फीसदी है, जो 2030 तक 3 फीसदी तक पहुंच सकती है. भारत की करीब 70% बिजली अभी भी कोयले से बनती है. इसका मतलब है कि अधिक डेटा, अधिक ऊर्जा, और संभावित रूप से अधिक कार्बन उत्सर्जन.
बड़े या हाइपरस्केल डेटा सेंटर 100,000 से अधिक वर्ग फुट क्षेत्र में लगते हैं. इसमें हजारों-लाखों सर्वर्स होते हैं, जैसा कि AWS, Google, Microsoft के डेटा सेंटर. बड़े डेटा सेंटर रोजाना लाखों घरों जितनी बिजली खाते हैं, और ये खपत कभी नहीं रुकती. इसे एक कैलकुलेशन से समझना चाहिए.
डेटा सेंटर की बिजली की जरूरत पावर (मेगावाट या MW) में बताई जाती है, जो बताती है कि वो हर पल कितनी बिजली खा रहा है. क्योंकि ये 24 घंटे, 365 दिन चलते रहते हैं, इसलिए हम रोज़, महीने या साल की कुल बिजली को kWh या MWh में कैलकुलेट करते हैं.
एक मध्यम-बड़ा डेटा सेंटर (50 MW) हर दिन 1,200,000 kWh (12 लाख यूनिट) बिजली इस्तेमाल करता है. यह लगभग 2.7 से 3 लाख औसत भारतीय घरों की एक दिन की बिजली के बराबर है. 2024-25 में भारत में औसत घर साल भर में करीब 1,600-1,800 kWh इस्तेमाल कर रहा था. यानी रोजाना औसतन 4-5 kWh.
एक हाइपरस्केल डेटा सेंटर (100 MW, जैसे बड़े क्लाउड या AI सेंटर) हर दिन 2,400,000 kWh (24 लाख यूनिट) खर्च करता है. यह 5.4 से 6 लाख घरों की एक दिन की जरूरत जितनी बिजली है. यानी एक मध्यम शहर के आधे से ज्यादा घरों जितनी. साल भर में ये 8.76 अरब यूनिट (876 मिलियन kWh) हो जाती है.
यही वजह है कि भारत जैसे देश में इनकी बढ़ती संख्या से ग्रिड पर दबाव पड़ रहा है, खासकर गर्मियों में जब एसी और कूलिंग की डिमांड पहले से ज्यादा होती है.
कितना पानी पी जाते हैं डेटा सेंटर?
पानी की कहानी और भी संवेदनशील है. भारत के पास दुनिया की 18% आबादी है, लेकिन जल संसाधन मात्र 4 प्रतिशत ही हैं. अनुमान है कि 2025 में डेटा सेंटर्स ने लगभग 150 अरब लीटर पानी इस्तेमाल किया, जो 2030 तक 350 अरब लीटर से अधिक हो सकता है. मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहर, जहां 60 से 80% डेटा सेंटर्स केंद्रित हैं, पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं.
चूंकि डेटा सेंटर 24/7 चलते हैं, इसलिए पानी की जरूरत भी हर दिन, महीने या साल भर लगातार रहती है. ज्यादातर पानी वाष्पीकरण कूलिंग में उड़ जाता है, जहां गर्मी को बाहर निकालने के लिए पानी वाष्प बनकर हवा में मिल जाता है. डेटा सेंटर पानी की खपत को लीटर या किलोलीटर में मापा जाता है, और ये मुख्य रूप से कूलिंग के लिए इस्तेमाल होता है.
एक मध्यम-बड़ा डेटा सेंटर (20-50 MW) हर दिन 1 से 1.4 मिलियन लीटर (10-14 लाख लीटर) पानी इस्तेमाल कर सकता है. भारत में Deloitte की रिपोर्ट के अनुसार, 1 MW क्षमता वाले सेंटर को रोजाना 68,500 लीटर पानी चाहिए. तो 20 MW वाला सेंटर 13-14 लाख लीटर रोज़ पीता है. यह लगभग 20,000-27,000 औसत भारतीय घरों की एक दिन की पानी जरूरत के बराबर है. शहरी भारत में एक घर रोजाना औसतन 500-700 लीटर पानी इस्तेमाल करता है, जिसमें पीने, नहाना, कपड़े धोना आदि शामिल हैं.
एक हाइपरस्केल या बड़ा डेटा सेंटर (100 MW, जैसे AI या क्लाउड वाले बड़े सेंटर) हर दिन 8 लाख से 20 लाख लीटर (या ज्यादा) पानी खपत कर सकता है. IEA (इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी) के अनुसार, अमेरिका में 100 MW वाला टिपिकल हाइपरस्केल सेंटर रोज़ 20 लाख लीटर (2 मिलियन लीटर) पानी यूज करता है. भारत के गर्म मौसम में यह और बढ़ सकता है.
समाधान क्या है?
समाधान असंभव नहीं है, लेकिन आसान भी नहीं. रिन्यूएबल ऊर्जा, खासकर सोलर और विंड, डेटा सेंटर्स को अधिक टिकाऊ बना सकती है. लिक्विड कूलिंग और क्लोज्ड-लूप सिस्टम जैसी तकनीकें पानी की खपत को 60–70 प्रतिशत तक घटा सकती हैं. ट्रीटेड वेस्टवॉटर का उपयोग और बैटरी स्टोरेज से ग्रिड पर दबाव कम किया जा सकता है.
कई कंपनियां ESG रिपोर्टिंग के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर सख्त नीतियां और स्थानीय संसाधनों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण जरूरी है. भारत फिलहाल एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. एक ओर डिजिटल महाशक्ति बनने का सपना है, जिसमें AI, क्लाउड, और स्टार्टअप्स से भरा हुआ संसार है, जबकि दूसरी तरफ पानी, बिजली और पर्यावरण की सीमाएं हैं.
भारत में डेटा सेंटरों में कितना निवेश?
जब ढेरों कंपनियां भारत में डेटा सेंटरों में पैसा लगा रही हैं तो जाहिर है कि इस क्षेत्र में निवेश की रफ्तार एक अलग ही स्तर की है. 2026 तक कुल निवेश लक्ष्य लगभग 200 अरब डॉलर के आसपास आंका जा रहा है. अडानी समूह (Adani Group) करीब 100 अरब डॉलर, रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) 110 अरब डॉलर और टाटा समूह (Tata Group) अरबों डॉलर के निवेश की योजना जगजाहिर कर चुके हैं. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन जैसी कंपनियां भी भारत को रणनीतिक केंद्र मानकर भारी पूंजी लगा रही हैं. 2030 तक कुल निवेश 200 से 250 अरब डॉलर के बीच पहुंच सकता है.
यह निवेश केवल डेटा स्टोरेज के लिए नहीं है. यह 1 ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था के सपने को हकीकत में बदलने का प्रयास है. डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 जैसे कानून कंपनियों को डेटा देश में ही रखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. साथ ही IndiaAI मिशन जैसी पहल भारत को AI हब के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य लेकर चल रही हैं. भारत के पास विशाल उपभोक्ता बाजार है, मैन्युफैक्चरिंग की लागत कम है, और सरकार नीतिगत समर्थन दे रही है. इन सभी कारणों से वैश्विक कंपनियां भारत का रुख कर रही हैं.
भारत में कौन-कौन सी कंपनियों के डेटा सेंटर?
दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां भारत में अपनी मौजूदगी तेजी से बढ़ा रही हैं. अमेजन वेब सर्विसेज (Amazon Web Services) ने हैदराबाद में विशाल डेटा सेंटर स्थापित किया है और लगातार विस्तार कर रही है. गूगल क्लाउड (Google Cloud) ने नवी मुंबई में 3.81 लाख वर्ग फुट का परिसर 28 साल की लीज पर लिया है और विशाखापट्टनम में लगभग 15 अरब डॉलर के AI हब की दिशा में काम कर रहा है. माइक्रोसॉफ्ट एज्योर (Microsoft Azure) भी पुणे और अन्य शहरों में AI और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रहा है.
घरेलू कंपनियां भी इस रेस में दौड़ रही हैं. एयरटेल की एनएक्सट्रा डेटा (Nxtra Data) देशभर में कई फेसेलिटी चला रही है. सिफी टेक्नोलॉजीज (Sify Technologies) के पास 14 AI-रेडी सेंटर और 200 मेगावॉट से अधिक IT क्षमता है. कंट्रोलएस (CtrlS) और एसटी टेलीमीडिया ग्लोबल डेटा सेंटर्स (ST Telemedia Global Data Centres) सैकड़ों मेगावॉट क्षमता के साथ दर्जनों साइट्स संचालित कर रहे हैं. अडानीकनेक्स (AdaniConneX) चेन्नई और नोएडा में AI-तैयार डेटा सेंटर्स शुरू कर चुका है, जबकि योट्टा (Yotta) ने ग्रेटर नोएडा में बड़ा डेटा पार्क विकसित किया है. एनटीटी ग्लोबल डेटा सेंटर्स (NTT Global Data Centers) फिलहाल देश का सबसे बड़ा ऑपरेटर माना जाता है.
भविष्य में आने वालों की कतार भी लंबी है. ओरेकल (Oracle), मेटा (Meta) और रिलायंस जियो (Reliance Jio) ने एनवीडिया (NVIDIA) के साथ AI डेटा सेंटर्स की योजना बनाई है. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (Tata Consultancy Services) एक गीगावॉट क्षमता के सेंटर विकसित करने की घोषणा कर चुकी है, जिसमें ओपनएआई (OpenAI) पहला ग्राहक बताया गया है. लार्सन एंड टुब्रो (Larsen & Toubro) गीगावॉट स्तर की AI फैक्ट्री पर काम कर रही है. 2030 तक 80 से अधिक नए डेटा सेंटर्स के जुड़ने की संभावना है, जिनमें महाराष्ट्र लगभग 40% क्षमता के साथ अग्रणी रह सकता है.
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