ईरान का संकट हालिया दौर में इसलिए भी भारत के लिए ज्यादा चिंताजनक बन गया है, क्योंकि हम पहले से ही तीन मोर्चे पर फंसे हुए हैं. एक तरफ तो पाकिस्तान अपनी आतंकी गतिविधियों से हमें कमजोर बनाने और नुकसान पहुंचाने का काम कर रहा है तो दूसरी ओर चीन की विस्तारवादी नीतियों ने कई तरह की मुश्किलें खड़ी कर रखी हैं. अब अमेरिका से भी पिछले कुछ समय से रिश्ते तल्ख हो गए और वह भी अस्थिरता बनाने की कोशिश में लगा है. ऐसे में ईरान का कमजोर पड़ना भारत के लिए एक और संकट पैदा कर सकता है. चीन और पाकिस्तान तो लंबे समय से इसी ताक में हैं कि ईरान की कमजोरी का फायदा उठाया जा सकें.
भारत के लिए क्यों जरूरी है ईरान
ईरान में अगर सत्ता परिवर्तन होता है और भारत विरोधी मानसिकता बनती है तो इसका असर सिर्फ पश्चिमी एशिया तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर भारत तक भी आ जाएगा. भारत और ईरान के संबंधों की सबसे बड़ी कड़ी चाबहार पोर्ट है, जो भारत को ईरान के बंदरगाह तक सीधी पहुंच देता है. साथ ही अफगानिस्तान और मध्य एशिया से भी सड़क व रेल मार्ग से जोड़ता है. चाबहार बंदरगार और होर्मुज जलडमरूमध्य यूरोप और पश्चिमी देशों तक पहुंचने के लिए भारत का एकमात्र रास्ता भी है.
सत्ता बदली तो मंशा भी बदल सकती है
चाबहार बंदरगाह और होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता सत्ता के गलियारों से ही गुजरता है. अगर ईरान में सत्ता बदलती तो इन रास्तों और भारत को लेकर उसकी मंशा भी बदल सकती है. ऐसा हुआ तो भारत का बड़ा निवेश और व्यापार दोनों बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं. ट्रंप का टैरिफ भी हमें उतना नुकसा नहीं पहुंचा सका, जितना ईरान का यह संकट पहुंचा सकता है. जेएनयू में विदेशी मामलों के प्रोफेसर राजन कुमार का कहना है कि खामनेई सरकार के जाने के बाद चाबहार पर कोई जोखिम बढ़ता है तो यह भारत के लिए होस्टेज वाली स्थिति हो जाएगी. भारत ने इस बंदरगार पर 9 हजार करोड़ से भी ज्यादा का निवेश किया है. ईरान का गलत फैसला इस निवेश को डुबा सकता है.
पाकिस्तान पर रखनी होगी नजर
ईरान वैसे तो इस्लामिक देश है, लेकिन यहां शिया मुसलमानों की पकड़ ज्यादा है. ईरान की इस स्थिरता को पाकिस्तान सुन्नी गुटों की मदद से लंबे समय से नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है जो भारत विरोधी एजेंडा भी चलाते हैं. साल 1990 और 2000 में भारत और ईरान ने मिलकर तालिबान के खिलाफ कदम उठाया था, जिसे पाकिस्तानी सरकार का समर्थन प्राप्त था. भारत के इस गठजोड़ और दखल से इस्लामाबाद को गहरी चोट पहुंची थी और तभी से वह ईरान के कमजोर होने का इंतजार कर रहा था. इतना ही नहीं, पाकिस्तान ने जब साल 1990 में कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ दुनियाभर में लॉबिंग शुरू की थी, तब भी ईरान ने हमारा ही समर्थन किया था.
ईरान कमजोर होता है तो क्या होगा
अगर मौजूदा हालात में ईरान आंतरिक रूप से कमजोर पड़ता है तो पाकिस्तान एक बार फिर यहां सिर उठा सकता है. उसकी कमजोरी या गलत हाथ में सत्ता जाने पर पाकिस्तान के मंसूबे पूरे होने की गुंजाइश भी बढ़ जाएगी. साथ ही चाबहार प्रोजेक्ट को नुकसान पहुंचा तो यह पाकिस्तान और चीन की जीत ही माना जाएगा. लिहाजा जरूरी है कि ईरान मजबूत बना रहे और भारत को उसका सहयोग हमेशा मिलता रहे.
चीन भी बढ़ा रहा अपने कदम
ईरान भले ही पाकिस्तान के खिलाफ हमेशा भारत के पक्ष में खड़ा रहा है, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि उसका सबसे बड़ा सहयोगी चीन है, जिसके साथ सबसे ज्यादा कारोबार होता है. साल 2021 में बीजिंग और तेहरान ने 25 साल तक सहयोग के लिए एक करार किया था. साल 2025 में चीन ने ईरान से 14.5 अरब डॉलर का सामान खरीदा था. अमेरिका के प्रतिबंध लगाने के बावजूद चीन ने ईरान से भारी मात्रा में कच्चा तेल भी खरीदा. चीन को यह बात लंबे समय से खटक रही है कि ईरान में भारत ने चाबहार बंदरगाह पर भारी निवेश क्यों किया. अगर हालात बदले तो चीन इसका फायदा उठा सकता है और वहां भारी मात्रा में निवेश करके भारत के रिश्ते को भी चोट पहुंचा सकता है.
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