वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार, दोनों पक्षों की टीमें वर्चुअल माध्यम से लंबित मुद्दों पर लगातार चर्चा कर रही हैं. हालांकि कोई आधिकारिक समय सीमा तय नहीं की गई है, लेकिन बातचीत अब निर्णायक स्तर पर है. यूरोपीय व्यापार आयुक्त मारोस सेफकोविक ने भी अपने बयान में संकेत दिया है कि दोनों पक्ष एक संतुलित समझौते के बेहद करीब हैं, जो दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए फायदेमंद साबित होगा.
बाजार पहुंच और टैरिफ
यूरोपीय संघ भारत से ऑटोमोबाइल (विशेष रूप से लग्जरी कारों), वाइन, स्पिरिट और डेयरी उत्पादों के लिए आसान रास्ता चाहता है. दूसरी ओर, भारत अपने कपड़ा, रसायन, प्रसंस्कृत खाद्य और फार्मास्यूटिकल्स के लिए यूरोपीय बाजारों में शून्य या कम टैरिफ की मांग कर रहा है.
प्रोफेशनल्स की आवाजाही
भारत के लिए यह डील इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हम अपने आईटी पेशेवरों, नर्सों और शेफ के लिए आसान वीजा और वर्क परमिट (Mode 4) की मांग कर रहे हैं. हालांकि, यूरोपीय संघ इस मुद्दे पर थोड़ा सतर्क रुख अपनाए हुए है.
डेटा पर्याप्तता और डिजिटल व्यापार
भारत चाहता है कि यूरोपीय संघ भारतीय डेटा सुरक्षा नियमों को ‘पर्याप्त’ (Data Adequacy) माने ताकि आईटी और बीपीएम (BPM) क्षेत्र में डेटा का प्रवाह सुचारू हो सके. वहीं, यूरोपीय संघ भारत के स्थानीय डेटा स्टोरेज नियमों को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कर चुका है.
नॉन-टैरिफ बाधाएं और CBAM
एक बड़ी चुनौती यूरोपीय संघ का ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) है, जो 2026-27 से भारतीय स्टील, एल्युमीनियम और सीमेंट पर कार्बन टैक्स लगा सकता है. भारत इस मामले में छूट या लंबी संक्रमण अवधि (Transition Period) की मांग कर रहा है.
आपकी जेब पर कैसे होगा असर
इस डील का सीधा असर आम भारतीय की जेब पर दो तरह से पड़ेगा, बचत और कमाई. अगर समझौता सफल रहता है, तो जर्मन कारें, यूरोपीय वाइन, चॉकलेट और प्रीमियम इलेक्ट्रॉनिक सामान काफी सस्ते हो जाएंगे, क्योंकि इन पर लगने वाली भारी इंपोर्ट ड्यूटी में बड़ी कटौती होगी. दूसरी ओर, भारत के कपड़ा, चमड़ा और जेम्स-ज्वेलरी सेक्टर के लिए यूरोप के दरवाजे खुलने से देश में रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा होंगे और आईटी प्रोफेशनल्स के लिए यूरोप जाकर काम करना आसान हो जाएगा, जिससे मध्यम वर्ग की आय में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है.
रणनीतिक महत्व और भविष्य
वर्तमान में भारत और यूरोपीय संघ के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 191 अरब डॉलर है, जिसे 2030 तक 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है. यह समझौता न केवल भारतीय निर्यातकों के लिए नए द्वार खोलेगा, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की स्थिति को और मजबूत करेगा. यदि कल की बैठक सफल रहती है, तो यह भारतीय कपड़ा और चमड़ा उद्योग के लिए संजीवनी साबित हो सकती है, जो वर्तमान में ऊंची ड्यूटी के कारण वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं.
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