फ्री ट्रेड एग्रीमेंट आखिर होता क्या है
फ्री ट्रेड एग्रीमेंट ऐसा समझौता होता है, जिसके तहत दो या उससे ज्यादा देश एक-दूसरे के सामान पर लगने वाले आयात शुल्क यानी टैरिफ को कम या खत्म करने पर सहमत होते हैं. इसका मकसद व्यापार को आसान बनाना और कंपनियों के लिए नए बाजार खोलना होता है. आम लोगों के लिए इसका मतलब होता है- ज्यादा विकल्प और कम कीमतें. भारत-EU डील भी इसी दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है.
भारत में क्या-क्या हो सकता है सस्ता
इस समझौते का सबसे ज्यादा फायदा कार और वाइन खरीदने वालों को मिल सकता है. फिलहाल भारत में आयातित कारों पर भारी टैक्स लगता है, जिससे BMW, वोक्सवैगन और रेनो जैसी यूरोपीय गाड़ियां बेहद महंगी हो जाती हैं. अगर टैरिफ घटते हैं, तो ये कारें पहले के मुकाबले किफायती हो सकती हैं. इसी तरह फ्रांस और इटली की वाइन पर लगने वाला शुल्क कम होने से उनकी कीमतें भी घट सकती हैं. इससे यूरोपीय कंपनियों को भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का मौका मिलेगा.
भारतीय निर्यातकों के लिए क्यों अहम है डील
इस एफटीए से भारतीय निर्यातकों को यूरोप के बड़े बाजार तक बेहतर पहुंच मिलने की उम्मीद है. टेक्सटाइल, गारमेंट्स, ज्वेलरी, लेदर गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल और दवाइयों जैसे सेक्टर को खास फायदा हो सकता है. फिलहाल भारत और EU के बीच सालाना व्यापार करीब 136.5 अरब डॉलर का है. अगर समझौते को यूरोपीय संसद से मंजूरी मिल जाती है, तो आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा काफी बढ़ सकता है.
बदलते वैश्विक हालात में डील की टाइमिंग
इस डील की अहमियत ऐसे समय में और बढ़ जाती है, जब वैश्विक व्यापार तनाव तेज हैं. 2025 में अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिए, जिससे भारतीय निर्यातकों पर दबाव आया. ऐसे में भारत वैकल्पिक बाजारों की तलाश में है और यूरोप इसमें एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है. दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान EU प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी संकेत दिया था कि समझौता करीब है, हालांकि कुछ मुद्दों पर अभी काम बाकी है.
व्यापार से आगे रक्षा और नौकरियों की बात
इस शिखर सम्मेलन में सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि रक्षा और सुरक्षा सहयोग पर भी समझौते होने की संभावना है. इसके अलावा एक मोबिलिटी एग्रीमेंट पर भी बातचीत चल रही है, जिससे भारतीय छात्रों और स्किल्ड वर्कर्स के लिए यूरोप में पढ़ाई और काम के मौके आसान हो सकते हैं. यह समझौता रोजगार के नए अवसर पैदा करने में भी मददगार साबित हो सकता है.
अभी कहां अटकी हैं बातचीत
हालांकि डील करीब है, लेकिन कुछ संवेदनशील मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं. EU चाहता है कि भारत ऑटो इंपोर्ट पर टैरिफ में बड़ी कटौती करे, जबकि भारत इस पर सतर्क रुख अपनाए हुए है. इसके अलावा यूरोप का नया कार्बन टैक्स भी चिंता का विषय है, जिससे स्टील, सीमेंट और एल्युमिनियम जैसे भारतीय निर्यात महंगे पड़ सकते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन अड़चनों को सुलझा लिया गया, तो भारत-EU एफटीए दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद साबित होगा और भारतीय उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में नई ताकत मिलेगी.
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