क्या सफलता का पैमाना सिर्फ मोटी सैलरी और आलीशान दफ्तर है? झारखंड के मनीष कुमार के लिए इसका जवाब ‘नहीं’ था. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) जैसी दिग्गज कंपनी में चयन होने के बावजूद मनीष ने महज एक महीने के भीतर इस्तीफा दे दिया. उन्होंने ऐसा क्यों किया और नौकरी छोड़ने का उन्हें मलाल क्यों नहीं है, आइये जानते हैं..
इस चकाचौंध के पीछे कुछ ऐसा था जो उन्हें भीतर ही भीतर कचोट रहा था. वे बताते हैं कि महज़ एक महीने के भीतर ही उन्हें एहसास हो गया कि कंप्यूटर स्क्रीन के सामने घंटों बैठकर कोडिंग करना या डेटा संभालना उनके बस की बात नहीं है. उन्हें उस “मानसिक शांति” की कमी खल रही थी, जिसे उन्होंने बचपन में अपने गांव के जंगलों में महसूस किया था.
होने लगी घुटन
मनीष के भीतर प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति प्रेम अचानक नहीं जागा. उनके पिता वन रक्षकों के साथ दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते थे. बचपन में मनीष अक्सर अपने पिता के साथ जंगल की उन ऊबड़-खाबड़ और रोमांचक पगडंडियों पर निकल जाया करते थे. पेड़ों की सरसराहट, वन्यजीवों की आहट और खुली हवा. यही वह दुनिया थी जिसने मनीष के व्यक्तित्व को गढ़ा था. इसीलिए, जब वे कोलकाता की बंद इमारतों में पहुंचे, तो उन्हें वहां ‘घुटन’ होने लगी.
एक महीने बाद ही दिया इस्तीफा
अक्सर लोग कॉर्पोरेट नौकरी इसलिए नहीं छोड़ पाते क्योंकि उन्हें भविष्य की चिंता होती है या समाज का डर होता है. लेकिन मनीष ने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनी. उन्होंने महज एक महीने में TCS की नौकरी से इस्तीफा दे दिया. कम वेतन और कॉर्पोरेट संस्कृति के साथ तालमेल न बैठ पाना भी एक कारण था, लेकिन मुख्य वजह थी अपनी मिट्टी और प्रकृति से दूर होना. उनके माता-पिता ने भी इस कठिन समय में उनका साथ दिया. उन्होंने मनीष को सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने की सलाह दी. अगले छह महीनों की कड़ी मेहनत और समर्पण के बाद, मनीष ने वन रक्षक परीक्षा पास की और अपने सपने को हकीकत में बदल दिया.
अब हैं जंगल के रखवाले
आज 30 वर्षीय मनीष कुमार वन विभाग में एक बीट अधिकारी (Beat Officer) के रूप में कार्यरत हैं. पिछले छह वर्षों में उनका काम केवल पेड़ों की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा है. उन्होंने वन्यजीवों की रक्षा की, अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाई और सबसे महत्वपूर्ण बात वहां रहने वाली आदिवासी आबादी का विश्वास जीता. वर्तमान में वे झारखंड के प्रसिद्ध मसानजोर डैम के किनारे स्थित एक सरकारी इको-टूरिज़्म रिसॉर्ट का प्रबंधन देख रहे हैं. पर्यटन को बढ़ावा देना और आने वाले पर्यटकों को प्रकृति के प्रति जागरूक करना अब उनका दैनिक कार्य है.
कोई पछतावा नहीं
मनीष आज झारखंड में अपने परिवार के पास हैं और प्रकृति की गोद में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें उस ‘नामी’ नौकरी को छोड़ने का मलाल है, तो उनके चेहरे पर एक सादगी भरी मुस्कान आ जाती है. मनीष कहते हैं, “मैं इससे ज़्यादा खुश नहीं हो सकता. कॉर्पोरेट दुनिया का हिस्सा बनना बुरा नहीं है, लेकिन वह मेरे लिए नहीं था. यहां मुझे वह सब मिला जिसकी मैंने हमेशा चाह रखी थी. समाज की सेवा, परिवार का साथ और जंगल की शांति.”
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