एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि मिडिल क्लास ने एफडी के बजाय एसआईपी यानी म्यूचुअल फंड में अपने निवेश को डायवर्ट कर दिया है. उनका लक्ष्य अब लंबी अवधि में मोटा फंड तैयार करना है, जो एसआईपी अन्य किसी भी विकल्पों से ज्यादा बेहतर तरीके से करता है. यही वजह है कि एफडी, सोने और अन्य निवेश को छोड़कर एसआईपी पर ज्यादा जोर देना शुरू कर दिया है. इसमें जोखिम भी कम रहता है और लॉन्ग टर्म तक रुकने पर ज्यादा रिटर्न भी मिलता है.
क्या कहते हैं आंकड़े
एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड इन इंडिया यानी एम्फी के जनवरी के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि एसआईपी के खाते अब 9.92 करोड़ को भी पार कर चुके हैं. एसआईपी में निवेश की गई कुल संपत्तियां भी बढ़कर 16.36 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है. यह म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में किए गए कुल 80 लाख करोड़ रुपये के निवेश का करीब 20 फीसदी है. यह बढ़ोतरी अचानक नहीं आई है, बल्कि मिडिल क्लास की बदलती मानसिकता और लॉन्ग टर्म के उनके लक्ष्यों को देखते हुए हुई है.
10 साल में बदल गया माहौल
आनंद के. राठी के सह-संस्थापक मीरा मनी ने कहा कि यह सांस्कृतिक बदलाव एकदम से नहीं आया. यह इसलिए हुआ क्योंकि अब ज्यादा लोग अपनी वित्तीय स्थिति को लेकर जागरूक हैं. डिजिटल-फर्स्ट प्लेटफॉर्म्स ने संपत्ति प्रबंधन को आसान बना दिया है और लोग समझने लगे हैं कि पारंपरिक सेविंग्स अकाउंट महंगाई की रफ्तार के साथ नहीं चल पाते. वित्त वर्ष 2016-17 में औसत मासिक एसआईपी इनफ्लो 4,000 करोड़ रुपये से कम था. एक दशक से भी कम समय में यह आंकड़ा करीब आठ गुना बढ़ गया है. अब सालाना एसआईपी फ्लो लगभग 45,000 करोड़ रुपये से बढ़कर हाल के वर्षों में करीब 2.9 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. अब हर महीने एसआईपी में करीब 31 हजार करोड़ तक का निवेश आता है.
ईएमआई जैसी लगती है एसआईपी
मिडिल क्लास अब एसआईपी को भी लोन की ईएमआई की तरह जिम्मेदारी के साथ देखता है और भविष्य के लिए इसे बेहतर मानता है. इससे उनके अंदर अनुशासन भी बढ़ रहा है, खासकर निवेश के लिए. अब उनकी मानसिकता बदल रही है. पहले सोचते थे कि खर्चे के बाद जो बचे उसे निवेश किया जाना चाहिए , लेकिन अब पहले निवेश और बाकी बचे उससे खर्चा चलाने की प्रवृत्ति जाग रही है. रिटेल निवेशकों ने एक महत्वपूर्ण बात समझ ली है. सिस्टमेटिक निवेश सिर्फ बाजार में भाग लेने के लिए नहीं है, इसने कई परिवारों को लंबे समय के वित्तीय लक्ष्यों की ओर लगातार काम करने में मदद की है.
महंगाई से निपटने में भी मददगार
एसआईपी निवेश एक प्रभावी महंगाई समायोजित रणनीति के रूप में उभरा है. इसका मतलब है कि यह विकल्प महंगाई को मात देने में भी मददगार है. फिक्स्ड डिपॉजिट पर असली रिटर्न अक्सर शून्य के करीब रहा है, क्योंकि उतनी ही दर से महंगाई भी बढ़ रही है और कई बार तो इसका रिटर्न निगेटिव हो जाता है. अब परिवार समझ रहे हैं कि सिर्फ पैसे बचाने से तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में खरीदने की ताकत नहीं बचती. इसी जागरूकता के चलते परिवार इक्विटी आधारित SIP की ओर बढ़ रहे हैं, जो ऐतिहासिक रूप से लंबी अवधि में 10–12 फीसदी रिटर्न देते हैं और महंगाई से आगे निकल जाते हैं.
संपत्ति बनाने का प्रभावी मंत्र
एसआईपी पर कम्पाउंडिंग का फायदा मिलता है, जो लंबी अवधि में आपके पैसों को कई गुना बढ़ाने में मददगार साबित होती है. अगर कोई 5,000 रुपये की एसआईपी शुरू करके लगातार 30 साल तक निवेश करता है और उसे 12 फीसदी का भी रिटर्न मिल रहा है तो यह रकम 1 करोड़ से कहीं ज्यादा पहुंच जाएगी. सोशल मीडिया पर वित्तीय साक्षरता, आसान कैलकुलेटर और पारदर्शी निवेश प्लेटफॉर्म्स ने परिवारों को कंपाउंडिंग का असर दिखाया है. जब निवेशक देखते हैं कि निवेश में बने रहना कितना ताकतवर है, तो वे फिर से छोटी अवधि के लिए बचत नहीं करना चाहते. एसआईपी का पैसा 10 साल से भी कम समय में 8 गुना तक बढ़ जाता है.
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