बांग्लादेश का टेक्सटाइल उद्योग एक बार फिर गहरे संकट में फंसता नजर आ रहा है. घरेलू मिल मालिकों ने आरोप लगाया है कि भारत से ड्यूटी फ्री यार्न के आयात ने उनके कारोबार को भारी नुकसान पहुंचाया है. सरकार से राहत न मिलने पर टेक्सटाइल मिलों ने 1 फरवरी से हड़ताल और मिलें बंद करने की चेतावनी दी है.
गैस संकट ने हालात को और बिगाड़ा
टेक्सटाइल मिलों की परेशानी सिर्फ आयात तक सीमित नहीं है. बीते तीन-चार महीनों से जारी गैस संकट ने उद्योग की कमर तोड़ दी है. अनियमित आपूर्ति, ऊंची कीमतों और सब्सिडी न मिलने के कारण उत्पादन क्षमता कई यूनिटों में करीब 50 प्रतिशत तक गिर गई है. बांग्लादेश टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन (BTMA) के अनुसार, गैस संकट की वजह से सेक्टर को करीब 2 अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है. इसके बावजूद सरकार की ओर से न तो सस्ती गैस दी गई और न ही टैक्स में कोई राहत घोषित हुई.
बंद होती मिलें, बढ़ता कर्ज और बेरोजगारी
BTMA का दावा है कि सस्ते भारतीय यार्न की वजह से घरेलू बाजार में 12,000 करोड़ टका से ज्यादा का माल बिना बिके पड़ा है. अब तक 50 से ज्यादा टेक्सटाइल मिलें बंद हो चुकी हैं, जिससे हजारों मजदूर बेरोजगार हो गए हैं. मिल मालिकों के लिए बैंक लोन चुकाना भी मुश्किल होता जा रहा है. एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि अगर 1 फरवरी से स्पिनिंग यूनिट्स बंद होती हैं, तो करीब 10 लाख लोगों की नौकरियों पर असर पड़ सकता है और सामाजिक अस्थिरता का खतरा भी बढ़ सकता है.
गारमेंट निर्यातकों से टकराव, सरकार पर दबाव
इस पूरे विवाद में बांग्लादेश के गारमेंट निर्यातक मिल मालिकों से अलग राय रखते हैं. निर्यातकों का कहना है कि देश में बनने वाला 10 से 30 काउंट का कॉटन यार्न भारतीय यार्न के मुकाबले महंगा है और अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बेहतर गुणवत्ता के कारण विदेशी यार्न को तरजीह देते हैं. उनका तर्क है कि अगर ड्यूटी-फ्री आयात रोका गया, तो बांग्लादेश की वैश्विक प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ जाएगी. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 में बांग्लादेश ने करीब 70 करोड़ किलो यार्न आयात किया, जिसमें 78 प्रतिशत हिस्सा भारत से आया. अब सरकार के सामने मिलों और निर्यातकों के बीच संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है.
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Rakesh Singh is a chief sub editor with 14 years of experience in media and publication. International affairs, Politics and agriculture are area of Interest. Many articles written by Rakesh Singh published in …और पढ़ें
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