भारत में नकदी का मोह लोगों से छूट नहीं रहा है. चाय-कॉफी पीकर भले ही लोग यूपीआई से पेमेंट करना पसंद करें, लेकिन बड़ी बड़ी खरीदारी के लिए नकदी का ही इस्तेमाल करना पसंद कर रहे हैं. यही वजह है कि भारत में करेंसी सर्कुलेशन में जोरदार उछाल आया है.
देश में नकदी का चलन बढने के कई कारण हैं.
डिजिटल इंडिया के दौर में जहां हम पान वाले को ₹5 भी स्कैन करके देते हैं, वहां ₹40 लाख करोड़ का कैश मार्केट में घूमना किसी ‘आर्थिक रहस्य’ से कम नहीं है. रिपोर्ट कहती है कि UPI ट्रांजैक्शन अब हर महीने ₹28.3 लाख करोड़ के पार जा रहे हैं. यह आंकड़ा देश के कुल कैश का लगभग 70% है. कायदे से तो जितना ज्यादा डिजिटल पेमेंट बढ़ता, उतना ही कैश कम होना चाहिए था. लेकिन यहां तो खेल ही उल्टा है.
कैश-टू-GDP रेश्यो घटा
हालांकि, एक अच्छी खबर यह है कि ‘कैश-टू-GDP रेश्यो’ 14.4% से घटकर 11% पर आ गया है. यानी अर्थव्यवस्था बड़ी हो रही है और उसमें डिजिटल का हिस्सा बढ़ रहा है, लेकिन कैश अपनी ‘इज्जत’ बचाने में कामयाब रहा है.
क्यों बढ रहा है नकदी का चलन
देश में नकदी का चलन बढने के कई कारण हैं. ऑनलाइन लेनदेन पर सरकार के रडार पर आने की वजह से भी बहुत से लोग नकदी को प्राथमिकता देते हैं. जुलाई 2025 में कर्नाटक के करीब 18,000 छोटे व्यापारियों को उनके UPI ट्रांजैक्शन के आधार पर GST नोटिस भेज दिए गए. इसके बाद बड़ी संख्या में व्यापारियों ने UPI से तौबा कर ली और ग्राहकों से कैश मांगना शुरू कर दिया. नतीजा, कर्नाटक में ATM से कैश निकालने की रफ्तार हर महीने ₹37 करोड़ तक बढ़ गई.
बैंकों के कम ब्याज की वजह से भी लोग ज्यादा नकदी का इस्तेमाल कर रहे हैं. खासकर ग्रामीण इलाकों में लोगों को बैंक के चक्कर काटने से अच्छा ‘कैश ऑन हैंड’ रखना ज्यादा सुरक्षित और आरामदायक लगता है. गांवों में तो आज भी ‘रोकड़ा’ ही असली ताकत है.
₹500 का नोट ज्यादा चलन में
₹2000 का गुलाबी नोट अब इतिहास हो चुका है और उसकी जगह ₹500 के नोट ने ले ली है. आज बाजार में मौजूद कुल कैश की वैल्यू में ₹500 के नोटों की हिस्सेदारी 86% हो चुकी है. RBI ने भी बैंकों को कहा है कि ATM में ₹100 और ₹200 के नोटों की संख्या बढ़ाएं ताकि आम आदमी को ‘चेंज’ की दिक्कत न हो.
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