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नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार को अपने जापान दौरे के दौरान SCMAGLEV ट्रेन की सवारी की. जापान के यामानाशी टेस्ट ट्रैक पर चल रही SCMAGLEV ट्रेन को दुनिया की सबसे एडवांस हाई स्पीड रेल टेक्नोलॉजी माना जाता है. यह मैग्नेटिक लेविटेशन सिस्टम पर आधारित है, जो ट्रेन को पटरी से ऊपर उठाकर 600 किलोमीटर प्रति घंटा तक की रफ्तार देने में सक्षम बनाता है. टोक्यो से ओसाका को जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी चूओ शिंकानसेन लाइन का हिस्सा यह परियोजना भविष्य की अल्ट्रा फास्ट, सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल मोबिलिटी की झलक पेश करती है.
दुनिया की सबसे एडवांस ट्रेन टेक्नोलॉजी: यह कोई साधारण ट्रेन नहीं बल्कि मैग्नेटिक लेविटेशन पर चलने वाली फ्यूचर टेक्नोलॉजी है, जिसे सेंट्रल जापान रेलवे कंपनी डेवलप कर रही है. फिलहाल इसका टेस्ट ट्रैक यामानाशी में है.

कैसे काम करती है: इसमें सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट लगे होते हैं जो ट्रेन को पटरी से करीब 10 सेंटीमीटर ऊपर उठा देते हैं. ट्रेन और ट्रैक के बीच सीधा संपर्क नहीं होता, इसलिए घर्षण लगभग खत्म हो जाता है और स्पीड बहुत ज्यादा मिलती है.

रिकॉर्ड तोड़ स्पीड: यह ट्रेन 500 से 600 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार पकड़ सकती है. साल 2015 में इसी ट्रैक पर इसने 603 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था.
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योगी आदित्यनाथ का अनुभव: 26 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस ट्रेन में करीब 501 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड पर सफर किया. उनका कहना था कि यह भविष्य की साफ और सटीक मोबिलिटी का मॉडल है.

बड़ी योजना, चूओ शिंकानसेन लाइन: यह तकनीक चूओ शिंकानसेन प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जो टोक्यो को ओसाका से जोड़ेगा. टोक्यो से नागोया की दूरी सिर्फ 40 मिनट में पूरी करने का लक्ष्य है और टोक्यो से ओसाका लगभग 1 घंटे में.

देरी और बढ़ती लागत: प्रोजेक्ट की लागत करीब 9 ट्रिलियन येन तक पहुंच चुकी है. पर्यावरणीय आपत्तियों और लंबी सुरंगों के निर्माण की वजह से इसकी शुरुआत 2027 से बढ़ाकर 2034 या 2035 कर दी गई है.

सुरक्षा और आराम: जापान भूकंप प्रभावित देश है, इसलिए ट्रेन यू शेप गाइडवे के अंदर चलती है. इससे पलटने या पटरी से उतरने का खतरा बेहद कम हो जाता है. पहिए न होने से शोर और झटके भी बहुत कम महसूस होते हैं.

भारत के लिए क्या मायने: अगर भविष्य में ऐसी तकनीक भारत में लाई जाती है तो सबसे बड़ी चुनौती होगी भारी लागत, जमीन अधिग्रहण, टनल निर्माण और हाई टेक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना. फिलहाल यह परियोजना दुनिया को अल्ट्रा फास्ट ट्रांसपोर्ट का भविष्य दिखा रही है.
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