अमेरिका के नए सैंक्शंस के बावजूद भारत का रूसी तेल प्रेम कम होने वाला नहीं है. Kpler की रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2026 में भारत का रूसी क्रूड इंपोर्ट फिर से बढ़ सकता है. सस्ता दाम और रिफाइनरी की जरूरतें भारत को रूस से खरीद जारी रखने के लिए मजबूर कर रही हैं. रूसी ऑयल पर बढ़ते दबाव के बीच भारत रूस का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है. डिस्काउंटेड क्रूड से भारत को इन्फ्लेशन कंट्रोल और बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन का फायदा मिल रहा है. यही वजह है कि US सैंक्शंस का असर भारत की खरीद पर सीमित दिख रहा है.
एनर्जी मार्केट ट्रैकर Kpler की लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2026 में भारत का रूसी ऑयल इंपोर्ट दोबारा पिक अप कर सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर 2025 में भारत ने रूस से करीब 1.3 मिलियन बैरल प्रति दिन क्रूड खरीदा था. जनवरी में यह लोडिंग्स बढ़कर 1.5 से 1.7 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच सकती हैं.
US सैंक्शंस क्या हैं और क्यों लगाए गए
अमेरिकी प्रशासन ने जनवरी 2026 में रूसी ऑयल टैंकर फ्लीट और उससे जुड़े ट्रेडर्स पर नए सैंक्शंस लगाए हैं. मकसद यह है कि रूस को ऑयल एक्सपोर्ट से मिलने वाला रेवेन्यू कम किया जाए. अमेरिका पहले ही रूसी क्रूड पर प्राइस कैप लागू कर चुका है. इसके बावजूद ग्राउंड रियलिटी यह है कि भारत ने इस प्राइस कैप को औपचारिक रूप से मानने से इनकार किया है और रूस से ट्रेड जारी रखा हुआ है.
रिपोर्ट के मुताबिक इन सैंक्शंस का भारत की खरीद पर डायरेक्ट असर सीमित रहने की उम्मीद है. कारण यह है कि रूसी सप्लाई अब शैडो फ्लीट के जरिए भी भेजी जा रही है जो प्रतिबंधों से बचने के लिए वैकल्पिक रूट और शिप्स का इस्तेमाल करती है.
भारत रूस से ऑयल खरीदना क्यों नहीं रोक रहा
सबसे बड़ी वजह है डिस्काउंट. रूसी Urals क्रूड ब्रेंट के मुकाबले 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा है. इतनी बड़ी बचत भारत जैसे बड़े इंपोर्टर के लिए अरबों डॉलर की बचत में बदल जाती है. यही कारण है कि सऊदी अरब, इराक या अफ्रीकी सप्लायर्स से महंगा तेल लेने के बजाय रूस भारत की पहली पसंद बना हुआ है.
दूसरी वजह है भारत की रिफाइनिंग कैपेसिटी. रिलायंस जामनगर और इंडियन ऑयल जैसी रिफाइनरीज हेवी और सॉर क्रूड को आसानी से प्रोसेस कर सकती हैं. रूसी ग्रेड्स जैसे Urals, ESPO और Sokol भारतीय रिफाइनरीज के लिए फिट बैठे हैं. इसका मतलब यह है कि टेक्निकल स्तर पर भी भारत के लिए रूसी क्रूड सबसे अनुकूल विकल्प बना हुआ है.
पॉलिटिकल स्टैंड और एनर्जी सिक्योरिटी का बैलेंस
भारत ने अमेरिका के सैंक्शंस की सार्वजनिक आलोचना नहीं की है लेकिन साफ शब्दों में कहा है कि एनर्जी खरीदना उसकी राष्ट्रीय जरूरत है. भारत का कुल ऑयल इंपोर्ट करीब 5 मिलियन बैरल प्रति दिन है. इसमें रूस की हिस्सेदारी अब 35 से 40 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. यह दिखाता है कि रूस भारत के लिए केवल एक सप्लायर नहीं बल्कि एनर्जी सिक्योरिटी पार्टनर बन चुका है. Kpler की रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर में थोड़ी नरमी के बाद जनवरी में लोडिंग्स दोबारा बढ़ने वाली हैं. इसका सीधा संकेत है कि सैंक्शंस के बावजूद सप्लाई चेन ने अपने रास्ते निकाल लिए हैं.
ग्लोबल ऑयल मार्केट पर क्या असर पड़ेगा
अगर भारत रूसी क्रूड की खरीद जारी रखता है तो ग्लोबल ऑयल प्राइस पर अचानक बड़ा प्रेशर नहीं आएगा. भारत की मजबूत डिमांड सप्लाई और प्राइस के बीच बैलेंस बनाए रखेगी. वहीं अमेरिका के लिए यह संकेत है कि सैंक्शंस से रूस की कमाई पर उम्मीद के मुताबिक असर नहीं पड़ रहा है. भारत के लिए तस्वीर साफ है. सस्ता रूसी तेल इंपोर्ट करने से घरेलू इन्फ्लेशन काबू में रहता है. रिफाइनिंग मार्जिन बेहतर होते हैं. फ्यूल प्राइस को स्थिर रखने में मदद मिलती है. यही वजह है कि जियोपॉलिटिकल दबाव के बावजूद भारत अपनी एनर्जी स्ट्रैटेजी को फिलहाल बदलने के मूड में नहीं दिख रहा है.
About the Author

जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
Discover more from Business News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.