अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ को रद्द कर बड़ा झटका दिया. फैसले के तुरंत बाद 10 फीसदी वैश्विक आयात शुल्क की नई घोषणा कर दी गई. व्हाइट हाउस अब सेक्शन 232 और 301 के जरिए टैरिफ बचाने की तैयारी में है. मामला अब कानूनी और राजनीतिक लड़ाई के नए दौर में प्रवेश कर चुका है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब सेक्शन 232-301 से टैरिफ बचाने की तैयारी में डोनाल्ड ट्रंप. (Image:Reuters)
तुरंत 10 फीसदी ग्लोबल टैरिफ की घोषणा
फैसले के बाद ट्रंप ने ओवल ऑफिस से 10 फीसदी वैश्विक आयात शुल्क लागू करने की घोषणा की. उन्होंने कहा कि यह ड्यूटी लगभग तुरंत प्रभाव से लागू होगी. प्रशासन का दावा है कि राजस्व में कमी नहीं आएगी और 2026 तक टैरिफ कलेक्शन लगभग पहले जैसा ही रहेगा. इस बीच कोर्ट ने मामले को इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट के पास आगे की प्रक्रिया तय करने के लिए भेज दिया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक 175 अरब डॉलर से ज्यादा की टैरिफ वसूली पर रिफंड की मांग उठ सकती है, जिससे कंपनियों में हलचल है.
प्लान-B: सेक्शन 232 और 301 क्या हैं?
व्हाइट हाउस अब दो प्रमुख व्यापार कानूनों-सेक्शन 232 और सेक्शन 301- का सहारा लेने की तैयारी में है. सेक्शन 232, 1962 के ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट से जुड़ा है और राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर टैरिफ लगाने की अनुमति देता है. वहीं सेक्शन 301, 1974 के ट्रेड एक्ट का हिस्सा है और अनुचित व्यापार प्रथाओं के खिलाफ कार्रवाई की शक्ति देता है. प्रशासन का मानना है कि ये दोनों प्रावधान IEEPA की तुलना में ज्यादा स्पष्ट और कानूनी रूप से मजबूत हैं, क्योंकि इन्हें खास तौर पर व्यापार शुल्क के लिए बनाया गया है.
जांच और कानूनी प्रक्रिया की चुनौती
हालांकि सेक्शन 232 और 301 को लागू करने के लिए औपचारिक जांच जरूरी होती है. सरकार को यह साबित करना होगा कि आयात से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है या व्यापारिक प्रथाएं अनुचित हैं. इस प्रक्रिया में समय लगता है और कानूनी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशासन को ठोस सबूत पेश करने होंगे, तभी नए टैरिफ अदालत में टिक पाएंगे.
टैरिफ की राजनीति और वैश्विक असर
टैरिफ को ट्रंप लंबे समय से आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रतीक बताते रहे हैं. उनका तर्क है कि अमेरिका को व्यापार घाटे और बाहरी निर्भरता से बचाने के लिए सख्त कदम जरूरी हैं. दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि ऐसे कदम से वैश्विक व्यापार तनाव बढ़ सकता है और उपभोक्ताओं पर लागत का बोझ पड़ सकता है. अगर 10 फीसदी वैश्विक ड्यूटी कायम रहती है, तो इसका असर कई देशों और कंपनियों पर पड़ेगा.
आगे क्या? बाजार और कंपनियों की नजरें कोर्ट पर
अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रशासन सेक्शन 232 और 301 के तहत कितनी तेजी से कार्रवाई करता है. कंपनियां संभावित रिफंड और नई जांच प्रक्रिया पर बारीकी से नजर रख रही हैं. यदि नए टैरिफ लागू होते हैं, तो व्यापारिक समीकरण फिर बदल सकते हैं. साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टैरिफ विवाद खत्म नहीं हुआ, बल्कि एक नए कानूनी और राजनीतिक दौर में प्रवेश कर गया है.
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Rakesh Singh is a chief sub editor with 14 years of experience in media and publication. International affairs, Politics and agriculture are area of Interest. Many articles written by Rakesh Singh published in …और पढ़ें
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