अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की अस्थायी छूट दी है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को फिलहाल थोड़ी राहत मिल सकती है. यह छूट उन रूसी तेल और पेट्रोलियम कार्गो पर लागू होगी जो 5 मार्च 2026 से पहले जहाजों पर लोड हो चुके हैं और 4 अप्रैल तक भारत पहुंच जाएंगे. हालांकि यह राहत सीमित है, क्योंकि अमेरिका ने इसे सिर्फ पहले से समुद्र में मौजूद कार्गो के लिए लागू किया है, जिससे रूस को नया बड़ा फायदा नहीं होगा. अनुमान है कि लगभग 20 मिलियन बैरल तेल इस छूट के दायरे में आ सकता है.
यूएस ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने यह 30 दिन की जनरल लाइसेंस जारी की है. यह छूट उन रूसी तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के लिए है जो 5 मार्च 2026 से पहले जहाजों पर लोड हो चुके हैं और 4 अप्रैल तक भारत पहुंच जाएंगे. ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने इसे जानबूझकर छोटी अवधि का कदम बताया है ताकि पहले से समुद्र में फंसे तेल को बाजार में आने दिया जाए. इससे रूस को नया बड़ा फायदा नहीं होगा क्योंकि यह पहले से लोडेड कार्गो पर ही लागू है. अनुमान है कि करीब 20 मिलियन बैरल तेल इस छूट के दायरे में आ सकता है.
भारत के लिए कितनी बड़ी राहत?
यह फैसला भारत के लिए तुरंत राहत देता है क्योंकि कई रिफाइनरियां जैसे मंगलौर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड के पास स्टॉक कम हैं. रूसी तेल पहले से एशिया की तरफ रीडायरेक्ट हो रहा है और डिस्काउंट पर मिल रहा है. भारत ने पिछले सालों में रूस से सस्ता तेल खरीदकर अच्छा फायदा उठाया था. अब इस छूट से भारत को वैकल्पिक सप्लाई मिलेगी और ग्लोबल मार्केट में तेल की कमी नहीं होने देगी. ब्रेंट क्रूड 5 मार्च को करीब 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था और डब्ल्यूटीआई 78.85 डॉलर के करीब ट्रेड कर रहा था.
लेकिन यह राहत सिर्फ छोटी अवधि की है. मनीकंट्रोल की रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन के साथ कॉम्पिटिशन और खाड़ी पर ज्यादा निर्भरता से फायदे सीमित रहेंगे. चीन भी रूसी तेल का बड़ा खरीदार है और दोनों देशों में कॉम्पिटिशन बढ़ रहा है. साथ ही भारत की खाड़ी देशों पर निर्भरता ज्यादा है, जहां से तेल होर्मुज से गुजरता है. अगर संघर्ष लंबा चला तो सप्लाई चेन में समस्या बनी रहेगी. अमेरिका ने पहले रूस से तेल खरीदने पर दबाव बनाया था और टैरिफ भी लगाए थे लेकिन अब मिडिल ईस्ट क्राइसिस के कारण यह छूट दी गई है.
डाइवर्सिफिकेशन पर फोकस जरूरी
एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह कदम ग्लोबल एनर्जी मार्केट को स्थिर रखने के लिए है. भारत जैसे बड़े आयातक देशों को सप्लाई चेन में रुकावट से बचाना जरूरी है. लेकिन लंबे समय में भारत को डाइवर्सिफिकेशन पर फोकस करना चाहिए. ज्यादा सोर्स से तेल लाना, अमेरिका या वेनेजुएला जैसे देशों से खरीद बढ़ाना और घरेलू उत्पादन बढ़ाना फायदेमंद होगा. फिलहाल यह 30 दिन की छूट भारतीय रिफाइनरियों को सांस लेने का मौका देगी और तेल की कीमतों पर तुरंत दबाव कम करेगी. अमेरिका की यह छूट भारत के लिए अच्छी खबर है लेकिन सिर्फ अस्थायी है. ईरान युद्ध से बने संकट में रूसी तेल की सप्लाई जारी रखने से भारत को फायदा मिलेगा लेकिन चीन की कॉम्पिटिशन और खाड़ी एक्सपोजर से चुनौतियां बनी रहेंगी. भारत को स्मार्ट तरीके से एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत करनी होगी ताकि भविष्य में ऐसे संकट आसानी से झेल सके.
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