अमेरिका की बदलती व्यापारिक नीतियों और ट्रंप प्रशासन की अस्थिरता के कारण डॉलर चार साल के सबसे निचले स्तर पर आ गया है. टैरिफ युद्ध और ग्रीनलैंड विवाद जैसे कारणों ने निवेशकों को डॉलर छोड़कर सोने और अन्य विदेशी मुद्राओं की ओर भागने पर मजबूर कर दिया है. हालांकि ट्रंप एक कमजोर डॉलर को अमेरिकी निर्यात के लिए फायदेमंद मान रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि नीतियों में बार-बार बदलाव से वैश्विक स्तर पर डॉलर का दबदबा कम हो रहा है. आने वाले समय में डॉलर में और गिरावट की संभावना है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के समीकरणों को पूरी तरह बदल सकती है.
इस गिरावट के पीछे सिर्फ आर्थिक कारण ही नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव भी जिम्मेदार हैं. हाल ही में अमेरिका और यूरोप के बीच ‘ग्रीनलैंड’ को लेकर पैदा हुए विवाद ने आग में घी डालने का काम किया है. इसके अलावा, बाजार में इस बात की भी चर्चा है कि ट्रंप प्रशासन जानबूझकर डॉलर को कमजोर रखना चाहता है ताकि अमेरिकी निर्यात (Exports) को बढ़ावा मिल सके. ट्रंप ने खुद भी पिछले साल एक बयान में कहा था कि “कमजोर डॉलर के साथ आप मजबूत डॉलर के मुकाबले कहीं ज्यादा पैसा बना सकते हैं.”
डॉलर गिरने की मुख्य वजहें और बाजार का डर
- ट्रंप की अनिश्चित नीतियां: ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के रोबिन ब्रूक्स का कहना है कि सरकार की नीतियां बहुत अस्थिर हैं. कभी किसी मुद्दे पर तनाव बढ़ा दिया जाता है और फिर अचानक पीछे हट जाते हैं. इस उतार-चढ़ाव से अमेरिका की साख को नुकसान पहुंच रहा है.
- गोल्ड की ओर झुकाव: निवेशक अब डॉलर छोड़कर सोने (Gold) में पैसा लगा रहे हैं, जिसकी कीमतें पिछले एक साल में लगभग दोगुनी हो गई हैं. इसके अलावा यूरो, पाउंड और उभरते बाजारों की मुद्राओं में भी निवेश बढ़ रहा है.
- ब्याज दरों में कटौती: ट्रंप प्रशासन द्वारा ब्याज दरों में कटौती के लिए बनाए जा रहे दबाव ने भी डॉलर को कमजोर किया है. निवेशकों को अब अमेरिका के बाहर निवेश के ज्यादा बेहतर मौके दिख रहे हैं.
क्या और गिरेगा डॉलर?
डच और डेनिश पेंशन फंड जैसे बड़े संस्थानों ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स में अपनी हिस्सेदारी कम करना शुरू कर दिया है. आईएनजी (ING) के ग्लोबल हेड क्रिस टर्नर का मानना है कि इस साल डॉलर में 4-5% की और गिरावट आ सकती है. हालांकि अमेरिकी शेयर बाजार अभी भी ऊंचाइयों पर हैं, लेकिन डॉलर की कमजोरी यह संकेत दे रही है कि वैश्विक रिजर्व करेंसी के रूप में इसका दबदबा अब धीरे-धीरे कम हो रहा है.
अगर डॉलर इसी तरह गिरता रहा, तो अमेरिका में आयात होने वाली चीजें महंगी हो जाएंगी, जिससे वहां महंगाई बढ़ सकती है. ट्रंप इसे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए अच्छा मान रहे हैं, लेकिन अस्थिर नीतियों के कारण निवेशकों का भरोसा डगमगाना लंबी अवधि में अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम भरा हो सकता है. फिलहाल, दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपनी रणनीति बदल रहे हैं और डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिशों में जुटे हैं.
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जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
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