बाजार विश्लेषकों और कमोडिटी एक्सपर्ट्स के बीच अब चर्चा इस बात पर नहीं है कि तांबा कितना बिकेगा, बल्कि इस पर है कि क्या पर्याप्त तांबा उपलब्ध होगा? अनुमान है कि 2026 तक वैश्विक बाजार में तांबे की सप्लाई में एक ‘स्ट्रक्चरल कमी’ देखने को मिल सकती है. नई खदानों को विकसित करने और उत्पादन शुरू करने में अक्सर 10 से 15 साल का लंबा समय लगता है, जबकि मांग हर साल तेजी से बढ़ रही है. इस वजह से तांबे में निवेश लॉन्ग टर्म में फायदेमंद हो सकता है. तांबे की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कई बार $13,000 प्रति टन के ऐतिहासिक स्तर को पार कर चुकी हैं.
कैसे करें कॉपर ईटीएफ में निवेश?
मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, वेल्थ इनरिच (Wealth Enrich) के संस्थापक अद्वैत अरोड़ा जैसे वेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि निवेशकों को अब तांबे को पारंपरिक एसेट्स के बजाय ‘नए दौर के गोल्ड’ के रूप में देखना चाहिए. उनके मुताबिक, तांबे में निवेश करना सीधे तौर पर भविष्य के इंफ्रास्ट्रक्चर और क्लीन एनर्जी की थीम पर दांव लगाने जैसा है. एक्सपर्ट्स ने तीन प्रमुख ईटीएफ सुझाए हैं. आइये इनके बारे में जानते हैं-
Global X Copper Miners ETF (COPX) : यह इस श्रेणी का सबसे बड़ा और भरोसेमंद ईटीएफ है. करीब $5.83 अरब की संपत्ति (Net Assets) को संभालने वाला यह फंड दुनिया भर की लगभग 40 प्रमुख तांबा खनन कंपनियों में निवेश करता है. इसका एक्सपेंस रेशियो 0.65% है, जो ग्लोबल स्टैंडर्ड के हिसाब से उचित माना जाता है.
यूनाइटेड स्टेट्स कॉपर इंडेक्स फंड (CPER): यदि आप कंपनियों के बजाय सीधे तांबे की कीमतों के उतार-चढ़ाव से मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो CPER एक बेहतर विकल्प है. यह फंड सीधे ‘कॉपर फ्यूचर्स’ को ट्रैक करता है. पिछले एक साल में इसने निवेशकों को करीब 38 प्रतिशत का शानदार रिटर्न दिया है.
iShares Copper and Metals Mining ETF (ICOP): साल 2023 में लॉन्च हुए इस ईटीएफ ने बहुत कम समय में निवेशकों का ध्यान खींचा है. यह केवल तांबे तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य औद्योगिक धातुओं की माइनिंग कंपनियों को भी कवर करता है. साल 2025 में इस ईटीएफ ने करीब 78 प्रतिशत का धमाकेदार रिटर्न देकर सबको चौंका दिया है.
ऐसे कर सकते हैं निवेश?
भारतीय निवेशक आरबीआई की Liberalised Remittance Scheme (LRS) के तहत ओवरसीज इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म्स (जैसे Vested, IndMoney आदि) का उपयोग करके इन ग्लोबल ईटीएफ में निवेश कर सकते हैं. हालांकि, इसमें निवेश करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:-
- करेंसी रिस्क: डॉलर और रुपये की विनिमय दर में बदलाव आपके रिटर्न को प्रभावित कर सकता है.
- टैक्सेशन: विदेशी निवेश पर लगने वाले टीसीएस (TCS) और कैपिटल गेन टैक्स के नियमों को समझना जरूरी है.
- एक्सपेंस रेशियो: विदेशी फंड्स के प्रबंधन शुल्क भारतीय ईटीएफ की तुलना में अलग हो सकते हैं.
क्या तांबा पूरी तरह सुरक्षित है?
भले ही लॉन्ग टर्म में तांबे की कहानी बहुत मजबूत दिखती है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह सोना (Gold) नहीं है. सोना एक ‘सेफ हेवन’ एसेट है जो मुसीबत के समय चमकता है, जबकि तांबा एक औद्योगिक धातु है. यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी सुस्ती आती है, तो तांबे की मांग और कीमतें तेजी से गिर सकती हैं. इसके अलावा, चिली और पेरू जैसे बड़े तांबा उत्पादक देशों में राजनीतिक अस्थिरता या नीतियों में बदलाव भी कीमतों पर सीधा असर डालते हैं. इसलिए, तांबे को पोर्टफोलियो का हिस्सा बनाते समय इसे ‘हाई-रिस्क, हाई-रिवॉर्ड’ श्रेणी में रखना चाहिए.
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