आजकल लोग नया फोन, बाइक, कार या घर खरीदने के लिए EMI का सहारा लेते हैं. लेकिन बिना सोच-समझकर EMI लेना बाद में आर्थिक परेशानी बना सकता है.इसीलिए 2-6-10 नियम समझना जरूरी है. यह आसान फॉर्मूला बताता है कि आपकी सैलरी के हिसाब से कितनी कीमत का सामान खरीदना सही रहेगा, ताकि आप कर्ज के बोझ में न फंसें. ये एक आसान फाइनेंशियल फॉर्मूला आपको कर्ज के जाल से फ्री कर सकता है. इस नियम में 2,6 और 10 का क्या मतलब है, ये समझना बेहद आसान है.
ये नियम तीन हिस्सों में बंटा है. पहला ‘2’ सामान की कुल कीमत जोकि आपकी महीने की सैलरी के आधे से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. यानी 2 हफ्ते की कमाई से ज्यादा न खर्च करें. जैसे अगर आप महीने में 50 हजार रुपये कमाते हैं, तो उस सामान पर ज्यादा से ज्यादा 25 हजार रुपये ही खर्च करें. अगर आपकी इन-हैंड सैलरी 40 हजार है, तो भी 20 हजार तक का फोन ही ठीक रहेगा. एक महीने या दो महीने की पूरी सैलरी एक फोन पर उड़ा देना फाइनेंशियली बड़ी गलती है. क्योंकि फोन खरीदते ही उसकी वैल्यू 20 प्रतिशत तक गिर जाती है और एक साल बाद रीसेल वैल्यू आधी भी नहीं रहती. जैसे 50 हजार का फोन 25 हजार में भी मुश्किल से बिकेगा.
EMI की अवधि
इसके बाद आता है ‘6’ यानी EMI की अवधि 6 महीने से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. लंबी EMI जैसे 18-24 महीने की किस्तें चलती रहती हैं. तब आप सामान की किस्तें चुकाते रहते हैं जिससे फाइनेंशियल स्ट्रेस बढ़ता है. इससे कर्ज पर इंटरेस्ट भी लगता रहता है. छोटी EMI से जल्दी कर्ज मुक्त हो जाते हैं और टेंशन कम रहती है.
10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए मंथली EMI
फिर आता है ’10’ जिसका मतलब है कि मासिक EMI आपकी महीने की कुल कमाई के 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. अगर इन-हैंड सैलरी 40 हजार है, तो EMI 4 हजार से ज्यादा न हो. इससे घर का बजट नहीं बिगड़ता, सेविंग्स सुरक्षित रहती हैं और क्रेडिट स्कोर भी अच्छा बना रहता है. अगर EMI ज्यादा हो तो रोजमर्रा के खर्चों पर असर पड़ता है.
ये नियम इसलिए काम करता है क्योंकि आजकल EMI बहुत आसान हो गई है, लेकिन लंबे समय में ये आदत खराब कर देती है. छोटी EMI देखकर लगता है बोझ कम है, लेकिन कुल मिलाकर ब्याज ज्यादा देना पड़ता है. अगर आप इस ‘2-6-10’ नियम को फॉलो करेंगे, तो महंगे सामान खरीदना मजेदार रहेगा, न कि परेशानी.
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