भारतीय प्रॉपर्टी मार्केट में में एनआरआई निवेश हमेशा से ही महत्वपूर्ण है. इनवेस्टोएक्सपर्ट एडवाइजर्स के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 में भारत के शीर्ष आठ महानगरों में होने वाली प्राथमिक आवासीय बिक्री में एनआरआई की हिस्सेदारी लगभग 18% से 22% के बीच रही है. खास बात यह है कि इस कुल निवेश का करीब 60% हिस्सा अकेले खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों से आया.
बदल सकता है एनआरआई का नजरिया
विशेषज्ञों के अनुसार, दुबई, अबू धाबी और कतर जैसे देशों में रहने वाले भारतीयों को वर्तमान परिस्थितियों में रोजगार और व्यवसाय को लेकर अनिश्चितता सताने लगी है. ऐसे माहौल में लोग भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए निवेश के बजाय नकदी बचाने पर जोर देते हैं. दिल्ली के एक प्रमुख लग्जरी प्रॉपर्टी सलाहकार का मानना है कि खाड़ी के एनआरआई फिलहाल किसी बड़े निवेश सौदे के बजाय अपना ‘कैश रिजर्व’ बढ़ाने की ओर झुक रहे हैं.
कितने निवेश की उम्मीद
अनुमान है कि 2025-26 तक एनआरआई रियल एस्टेट में निवेश का आंकड़ा 18 से 20 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. इसमें मध्य-पूर्व के हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल (HNI) मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में लग्जरी संपत्तियों के मुख्य खरीदार बनकर उभरे हैं. लेकिन अब युद्ध की आहट ने इस रफ़्तार पर ब्रेक लगाने का संकेत दिया है.
सुरक्षा की प्राथमिकता
प्रॉपर्टी मास्टर के सह-संस्थापक और प्रबंध निदेशक गोल्डी अरोड़ा का इस पर कहना है, “ईरान-यूएई तनाव का भारतीय रियल एस्टेट पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि यह संघर्ष कितना लंबा खिंचता है.” अरोड़ा के मुताबिक, खाड़ी में रहने वाले अधिकांश एनआरआई बड़े व्यवसायी या वरिष्ठ पदों पर तैनात पेशेवर हैं, जिनकी आय सीधे तौर पर क्षेत्रीय व्यापारिक चक्र से जुड़ी होती है. स्थिति स्पष्ट होने तक वे ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपना रहे हैं, जिससे बड़े टिकट वाले लग्जरी सौदों में देरी हो सकती है.
दुबई स्थित रियल एस्टेट रणनीतिकार और प्रोएक्ट लग्जरी रियल एस्टेट की सीईओ रितु कांत ओझा ने एक व्यवहारिक पहलू की ओर इशारा किया है. उनके अनुसार, एयरस्पेस मैनेजमेंट की समस्याओं की वजह से कई एनआरआई संपत्ति के पंजीकरण (Registration) के लिए भारत की यात्रा नहीं कर पा रहे हैं. रितु कांत ओझा बताती हैं कि यूएई ने हालिया खतरों को जिस तरह सफलतापूर्वक निष्क्रिय किया है, उससे वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर पर लोगों का भरोसा बढ़ा है. इसके चलते कई निवेशक अपनी पूंजी भारत भेजने के बजाय फिलहाल यूएई में ही रोके हुए हैं, ताकि वहां के प्रॉपर्टी बाजार में किसी भी संभावित गिरावट का लाभ उठाकर कम कीमत पर निवेश किया जा सके.
कितना बड़ा है संकट?
हालांकि बाजार में सुस्ती की चर्चा है, लेकिन विशेषज्ञ इसे स्थायी संकट नहीं मान रहे हैं. इनवेस्टोएक्सपर्ट एडवाइजर्स के प्रबंध निदेशक विशाल रहेजा इस स्थिति को एक “भावनात्मक झटका” करार देते हैं, न कि कोई संरचनात्मक व्यवधान. उनका कहना है कि भू-राजनीतिक अनिश्चितता आमतौर पर लोगों को अधिक सतर्क बनाती है, लेकिन यह घबराहट में तब्दील नहीं हुई है.
रहेजा का तर्क है कि संकट के समय पूंजी कभी गायब नहीं होती, बल्कि उसका स्थान बदल जाता है. इतिहास गवाह है कि भारत-पाकिस्तान संघर्षों के दौरान भी बाजार कुछ ही हफ्तों में सामान्य हो गया था. उनके अनुसार, वर्तमान लेनदेन चक्र (Transaction Cycle) में 30 से 60 दिन की देरी हो सकती है, लेकिन किसी बड़े तंत्रगत संकट की आशंका बेहद कम है.
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