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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक का आज यानी 8 अप्रैल को आखिरी दिन है। आज 10 बजे RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा बैठक में लिए गए फैसलों की जानकारी देंगे।
एक्सपर्ट्स के अनुसार इस बार रेपो रेट में बदलाव नहीं होगा। इसे 5.25% पर बरकरार रखा है। यानी लोन महंगे नहीं होंगे और आपकी EMI भी नहीं बढ़ेगी। इससे पहले फरवरी में भी रेपो रेट में बदलाव नहीं किया था।
RBI ने दिसंबर में ब्याज दर 0.25% घटाकर 5.25% की थीं। RBI जिस रेट पर बैंकों को लोन देता है उसे रेपो रेट कहते हैं। जब RBI रेपो रेट घटाता है, तो बैंकों को सस्ता कर्ज मिलता है और वो इस फायदे को ग्राहकों तक पहुंचाते हैं।
2025 में चार बार में 1.25% की कटौती
- फरवरी 2025 में ब्याज दरों को 6.5% से घटाकर 6.25% कर दिया था।
- मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की ये कटौती करीब 5 साल बाद की गई थी।
- दूसरी बार अप्रैल में हुई मीटिंग में भी ब्याज दर 0.25% घटाई गई।
- जून में तीसरी बार RBI में दरों में 0.50% कटौती की थी।
- दिसंबर में 0.25% की कटौती के बाद ब्याज दरें 5.25% पर आ गई थी।

हर दो महीने में होती है RBI की मीटिंग
मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी में 6 सदस्य होते हैं। इनमें से 3 RBI के होते हैं, जबकि बाकी केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। RBI की मीटिंग हर दो महीने में होती है। वित्त वर्ष 2025-26 में मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की कुल 6 बैठकें हुई। पहली बैठक 7-9 अप्रैल 2025 को हुई थी।
रेपो रेट क्या है, इससे लोन कैसे सस्ता होता है?
RBI जिस ब्याज दर पर बैंकों को लोन देता है उसे रेपो रेट कहते हैं। रेपो रेट कम होने से बैंक को कम ब्याज पर लोन मिलेगा। बैंकों को लोन सस्ता मिलता है, तो वो अकसर इसका फायदा ग्राहकों को पास कर देते हैं। यानी, बैंक भी अपनी ब्याज दरें घटा देते हैं।
रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ाता और घटाता क्यों है?
किसी भी सेंट्रल बैंक के पास पॉलिसी रेट के रूप में महंगाई से लड़ने का एक शक्तिशाली टूल है। जब महंगाई बहुत ज्यादा होती है, तो सेंट्रल बैंक पॉलिसी रेट बढ़ाकर इकोनॉमी में मनी फ्लो को कम करने की कोशिश करता है।
पॉलिसी रेट ज्यादा होगी तो बैंकों को सेंट्रल बैंक से मिलने वाला कर्ज महंगा होगा। बदले में बैंक अपने ग्राहकों के लिए लोन महंगा कर देते हैं। इससे इकोनॉमी में मनी फ्लो कम होता है। मनी फ्लो कम होता है तो डिमांड में कमी आती है और महंगाई घट जाती है।
इसी तरह जब इकोनॉमी बुरे दौर से गुजरती है तो रिकवरी के लिए मनी फ्लो बढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में सेंट्रल बैंक पॉलिसी रेट कम कर देता है। इससे बैंकों को सेंट्रल बैंक से मिलने वाला कर्ज सस्ता हो जाता है और ग्राहकों को भी सस्ती दर पर लोन मिलता है।
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