हैरानी की बात यह है कि जब ये निवेश आ रहा था, तब बाजार काफी ठंडा था. जहां सेंसेक्स और निफ्टी ने करीब 9 से 10.5 फीसदी की बढ़त दिखाई, वहीं बीएसई मिडकैप इंडेक्स सिर्फ 1.1 फीसदी चढ़ा और स्मॉलकैप इंडेक्स तो 6.6 फीसदी तक नीचे गिर गया.
हमारी सहयोगी वेबसाइट मनीकंट्रोल ने एक्सिस सिक्योरिटीज के राजेश पालविया के हवाले से लिखा कि इस भारी निवेश के पीछे का असली हीरो एसआईपी (SIP) है. उन्होंने कहा कि “निवेशकों ने मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों के पिछले 3 से 5 साल के शानदार रिकॉर्ड को देखते हुए गिरावट में भी अपनी खरीदारी जारी रखी. निवेशकों ने हर गिरावट का इस्तेमाल अपनी यूनिट्स की एवरेजिंग के लिए किया.”
मिडकैप और स्मॉलकैप के कितने शेयरों में गिरावट?
बाजार की गहराई को देखें तो स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण थी. मिडकैप इंडेक्स के 140 शेयरों में से 86 शेयर नुकसान में बंद हुए, जबकि स्मॉलकैप इंडेक्स के तो 1,186 शेयरों में से 871 शेयर लाल निशान में थे. फिर भी घरेलू निवेशकों का नजरिया नहीं बदला. विदेशी निवेशक जहां बड़े शेयरों से पैसा निकाल रहे थे, वहीं भारतीय निवेशकों ने स्मॉल और मिड कैप फंड्स को अपनी पहली पसंद बनाए रखा. कुल इक्विटी निवेश में मिडकैप और स्मॉलकैप फंड्स की हिस्सेदारी बढ़कर अब 14 फीसदी से ऊपर जा चुकी है, जो निवेशकों के बढ़ते साहस और मैच्योरिटी को दर्शाती है.
पर्सनल पोर्टफोलियो से कहीं बेहतर
एक्सपर्ट्स का कहना है कि करीब 16 महीनों तक सुस्त रिटर्न मिलने के बावजूद लोग बाजार से बाहर नहीं निकले, जो यह दिखाता है कि वे अब लंबी अवधि (3-4 साल) के लक्ष्य पर ध्यान दे रहे हैं.
इंडिपेंडेंट रिसर्च एनालिस्ट अम्बरीष बलिगा ने इस पर एक गहरी बात कही. उन्होंने बताया कि “म्यूचुअल फंड्स में निवेश इसलिए जारी है, क्योंकि इनका प्रदर्शन पर्सनल पोर्टफोलियो से काफी बेहतर रहा है.” उनके अनुसार, जहां कई लोगों के खुद के खरीदे हुए शेयरों की वैल्यू 20 से 30 फीसदी तक गिर गई, वहीं सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले मिड और स्मॉल-कैप फंड्स भी दिसंबर के अंत तक केवल 5 से 6 फीसदी ही नीचे थे. बलिगा ने यह भी आगाह किया कि जब तक नुकसान सीमित है, तब तक निवेशक पैसा लगाता रहेगा, लेकिन अगर भविष्य में गिरावट और गहरी हुई तो बाजार में नकदी की कमी और बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है.
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