इकोनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट में अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि यह संकट घरेलू खपत आधारित थीम से हटकर हार्ड एसेट्स की ओर झुकाव का समय है. उनका तर्क है कि दुनियाभर की सरकारें बढ़ते कर्ज और अनिश्चितता के दौर में एक ही दिशा में बढ़ रही हैं, ऐसे में सोना सबसे सुरक्षित बचाव का जरिया बनता है. वह कहते हैं कि ज्यादातर खुदरा निवेशकों के पोर्टफोलियो में कीमती धातुओं की हिस्सेदारी पर्याप्त नहीं है और इस अंतर को भरना जरूरी है. मौजूदा परिदृश्य में उनका जोर स्थिर और संतुलित एसेट एलोकेशन पर है.
33-33-33 पोर्टफोलियो फॉर्मूला क्या है
अजय श्रीवास्तव पिछले दो वर्षों से एक ही निवेश ढांचा सुझा रहे हैं. इसके तहत एक तिहाई हिस्सा भारतीय इक्विटी में, एक तिहाई कीमती धातुओं में और एक तिहाई अंतरराष्ट्रीय इक्विटी में होना चाहिए. कीमती धातुओं वाले हिस्से में लगभग साठ से सत्तर प्रतिशत सोना और बाकी चांदी रखने की सलाह दी गई है. उनका कहना है कि सोना केवल ट्रेडिंग का साधन नहीं बल्कि दीर्घकालिक सुरक्षा कवच है.
चांदी और बेस मेटल्स पर खास जोर
ऊर्जा संकट और औद्योगिक मांग को देखते हुए उन्होंने चांदी को खास महत्व दिया है. सौर ऊर्जा और बैटरी तकनीक में इस्तेमाल होने के कारण चांदी को मौजूदा दौर में बड़ा लाभार्थी बताया गया है. इसके अलावा एल्यूमिनियम, कॉपर और जिंक जैसे बेस मेटल खनन शेयरों को भी उन्होंने आकर्षक बताया है. यदि कच्चे तेल की तेजी के कारण रुपया कमजोर होता है, तो डॉलर में कीमत तय होने वाली कमोडिटी से जुड़ी कंपनियों को सीधा फायदा मिल सकता है.
एफएमसीजी और कंजम्प्शन से दूरी की सलाह
घरेलू खपत आधारित कंपनियों को लेकर उनका रुख सतर्क है. उनका मानना है कि ऊंची वैल्यूएशन और बढ़ती लागत के कारण इस सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है. अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं तो उसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ेगा. साथ ही खाड़ी देशों से आने वाली रेमिटेंस में कमी आने की आशंका भी है, जिससे अगले छह से नौ महीनों में उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति प्रभावित हो सकती है.
ऑटो सेक्टर में एक्सपोर्ट थीम
ऑटो सेक्टर, खासकर टू व्हीलर कंपनियों को उन्होंने अलग नजरिए से देखा है. उनका कहना है कि इन कंपनियों का अंतरराष्ट्रीय कारोबार मजबूत हुआ है और कमजोर रुपया इन्हें प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देता है. यदि वेस्ट एशिया के बाजार स्थिर होते हैं तो निर्यात के अवसर और बढ़ सकते हैं.
डिफेंस में विदेशी विकल्प बेहतर
डिफेंस थीम में दिलचस्पी रखने वाले निवेशकों को उन्होंने विदेशी बाजारों का रुख करने की सलाह दी है. उनका तर्क है कि वैश्विक स्तर पर हथियार और उन्नत तकनीक बनाने वाली कंपनियां पूरी क्षमता से काम कर रही हैं, जबकि भारत में यह क्षेत्र अभी सीमित दायरे में है.
विदेशी निवेशकों की नजर से भारत
विदेशी पोर्टफोलियो निवेश को लेकर भी उन्होंने साफ राय रखी है. वित्तीय सेवाएं, फार्मा के सीडीएमओ मॉडल और ऑटो एंसिलरी को छोड़ दें तो फिलहाल जोखिम से बचाव वाले माहौल में भारत के पास बहुत मजबूत कहानी नहीं है. ऐसे में चयनात्मक और संतुलित निवेश रणनीति ही समझदारी भरा कदम होगा.
(Disclaimer: यहां बताए गया स्टॉक्स सिर्फ जानकारी देने के उद्देश्य से हैं. यदि आप इनमें से किसी में भी पैसा लगाना चाहते हैं तो पहले एक्सपर्ट से परामर्श कर लें. आपके किसी भी तरह की लाभ या हानि के लिए लिए News18 जिम्मेदार नहीं होगा.)
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