सेबी ने दोनों एक्सचेंजों से कहा है कि कम से कम छह महीने तक कैश मार्केट में पर्याप्त ट्रेडिंग, निवेशकों की भागीदारी और सही प्राइस डिस्कवरी दिखानी होगी. इसके बाद ही इक्विटी डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स लॉन्च करने की मंजूरी मिल सकती है.
क्यों सेबी ने डेरिवेटिव्स की इजाजत रोकी
सेबी को चिंता है कि भारत में इक्विटी डेरिवेटिव्स बाजार पहले से ही बहुत बड़ा और अत्यधिक स्पेकुलेटिव हो चुका है. मौजूदा समय में ग्लोबल इंडेक्स ऑप्शंस ट्रेडिंग का 70 फीसदी से ज्यादा वॉल्यूम एनएसई (NSE) पर आता है. वहीं भारत में डेरिवेटिव्स प्रीमियम का टर्नओवर कैश मार्केट से दोगुना हो चुका है, जबकि अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजारों में यह अनुपात केवल 2 से 3 फीसदी के आसपास रहता है.
रेगुलेटर को यह भी डर है कि नए एक्सचेंज अगर बिना मजबूत कैश बेस के डेरिवेटिव्स लॉन्च करेंगे तो स्पेकुलेशन और बढ़ेगा. सेबी के मुताबिक, भारत में करीब 90 फीसदी रिटेल निवेशक डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग में नुकसान उठाते हैं. इसी वजह से सेबी चाहता है कि पहले कैश मार्केट मजबूत हो और निवेशक वास्तविक शेयर ट्रेडिंग में भाग लें.
NCDEX और MSE की मौजूदा स्थिति
एनसीडीईएक्स मुख्य रूप से एग्री कमोडिटी ट्रेडिंग के लिए जाना जाता है और इक्विटी सेगमेंट में इसका वॉल्यूम बहुत कम है. वहीं मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज का फोकस अब तक करेंसी डेरिवेटिव्स पर रहा है और इक्विटी ट्रेडिंग में इसकी हिस्सेदारी काफी पतली है.
दोनों एक्सचेंजों ने 2025 में कैपिटल रेजिंग की थी. एनसीडीईएक्स ने करीब 770 करोड़ रुपये जुटाए थे, जिसमें सिटाडेल सिक्योरिटीज (Citadel Securities) और टॉवर रिसर्च (Tower Research) जैसे बड़े ग्लोबल ट्रेडिंग फर्म निवेशक बने थे. वहीं एमएसई ने करीब 1,200 करोड़ रुपये जुटाए थे, जिसमें पीक एक्सवी (Peak XV), ग्रो (Groww) और जेरोधा (Zerodha) से जुड़ी इकाइयों ने निवेश किया था. सेबी ने दोनों एक्सचेंजों को अपनी टेक्नोलॉजी और ट्रेडिंग सिस्टम अपग्रेड करने को भी कहा है.
सेबी का साफ संदेश
रेगुलेटरी सूत्रों के मुताबिक सेबी ने स्पष्ट कहा है कि डेरिवेटिव्स की परमिशन तब तक नहीं मिलेगी जब तक कैश मार्केट में पर्याप्त लिक्विडिटी, पार्टिसिपेशन और सही प्राइस डिस्कवरी नहीं दिखती. सेबी का मानना है कि नए प्लेयर्स को बिना मजबूत कैश बेस के डेरिवेटिव्स लॉन्च करने की अनुमति देने से बाजार में जोखिम बढ़ सकता है.
बाजार और निवेशकों पर असर
सेबी के इस फैसले से एनएसई और बीएसई (BSE) का इक्विटी और डेरिवेटिव्स सेगमेंट में दबदबा फिलहाल बना रहेगा. एनसीडीईएक्स और एमएसई को पहले कैश सेगमेंट में मार्केट मेकर्स लाने होंगे और ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ाना होगा. यह फैसला रिटेल निवेशकों को अत्यधिक स्पेकुलेशन से बचाने की सेबी की बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें हाल के महीनों में टैक्स और रेगुलेशन से जुड़े कई सख्त कदम भी शामिल रहे हैं.
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