लिज्जत पापड़ से प्रेरणा लेकर बिहार की 12 जीविका दीदियों ने मिलकर पापड़ निर्माण का काम शुरू किया और आज यह पहल आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं. इसी मेहनत का नतीजा है कि आज पूरा जिला उनके पापड़ को पहचानने लगा है. पढ़िए कहानी
महिला उद्यमी समूह की सदस्य ममता देवी बताती हैं कि लिज्जत पापड़ की सफलता से उन्हें काफी प्रेरणा मिली. उन्होंने बताया कि लिज्जत पापड़ की शुरुआत भी कुछ महिलाओं ने संगठन के रूप में की थी और आज उसकी मांग हर घर में है. इसी सोच के साथ उन्होंने अपने जीविका समूह में पापड़ बनाने का प्रस्ताव रखा. सभी दीदियों के राय-विचार के बाद 12 महिलाओं ने मिलकर पापड़ बिजनेस शुरू करने का फैसला किया.
कच्चे माल से तैयार माल तक की पूरी प्रक्रिया
सहयोगी जीविका दीदी रोशन देवी बताती हैं कि पापड़ बनाने के लिए पहले बाजार से मूंग दाल और उड़द दाल समेत जरूरी कच्चा माल खरीदा जाता है. इसके बाद कुछ दीदियां मिलकर दाल की सफाई करती हैं और फिर उसे यूनिट में लाकर पापड़ तैयार किया जाता है. पूरी प्रक्रिया को आपसी तालमेल और जिम्मेदारी के साथ पूरा किया जाता है. वहीं आशा देवी ने बताया कि रोजाना 40 से 50 किलो तक कच्चा माल बाजार से लाया जाता है, जिससे प्रतिदिन 30 से 40 किलो तक पापड़ बनाए और बेचे जा रहे हैं. लगातार बढ़ती मांग के कारण उत्पादन भी धीरे-धीरे बढ़ाया जा रहा है.
बाजार से लेकर शादियों तक बढ़ी मांग
पापड़ की बिक्री को लेकर लोकल 18 पर रिंकू देवी बताती हैं कि सरकारी कार्यालयों की रसोई से लेकर जिले के बाजारों तक उनके पापड़ की अच्छी मांग है. इसके अलावा गांव-घर में होने वाली शादियों और आयोजनों में जीविका दीदियां खुद जाकर अपने उत्पाद की मार्केटिंग करती हैं. इसी मेहनत का नतीजा है कि आज पूरा जिला उनके पापड़ को पहचानने लगा है.
सोलर से घटा खर्च, बढ़ी आमदनी
जीविका कर्मी ने बताया कि शुरुआत में यूनिट बिजली से चलती थी, जिससे खर्च अधिक होता था. बाद में सोलर सिस्टम लगाया गया, जिससे बिजली का खर्च कम हुआ और बचत बढ़ी. वर्तमान में 12 जीविका दीदियां मिलकर इस यूनिट का संचालन कर रही हैं और रोजाना 5 से 6 हजार रुपये तक की बिक्री हो रही है. ऐसे में इस व्यवसाय को स्टार्ट करने वाली 12 सदस्यों में से प्रत्येक सदस्य की कमाई हर महीने 10 हजार से ज्यादा होती है. जबकि निर्माण कार्य में जुड़ी महिलाओं की कमाई भी 10 हजार तक रहती है.
यह पापड़ यूनिट सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की मेहनत, आत्मविश्वास और सामूहिक शक्ति की कहानी है. जीविका दीदियों की यह सफलता अब अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन रही है, जो स्वरोजगार के जरिए आत्मनिर्भर बनने का सपना देख रही हैं.
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