पिछले बजट में कई सकारात्मक कदम जरूर उठाए गए थे, जैसे कैपिटल एक्सपेंडिचर बढ़ाना और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर देना. आर्थिक सर्वे, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स और जनता की प्रतिक्रियाओं से यह साफ हुआ कि विकास की दिशा सही थी, लेकिन कई जरूरी क्षेत्रों में बदलाव की कमी महसूस की गई. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्थिक स्थिरता पर फोकस किया, लेकिन निजी निवेश की सुस्ती, घरेलू बचत दर में गिरावट और बढ़ती असमानता जैसी समस्याओं पर ठोस समाधान नहीं दिखा. इसी वजह से कई सेक्टर निराश नजर आए और अब 2026 के बजट से बड़ी उम्मीदें लगाई जा रही हैं.
पिछले साल की अधूरी मांगें?
डिजिटल एसेट्स और क्रिप्टोकरेंसी
डिजिटल एसेट्स और क्रिप्टोकरेंसी को लेकर भी पिछला बजट खामोश रहा. न तो टैक्स में कोई राहत मिली और न ही कोई स्पष्ट नीति सामने आई. वेब3 से जुड़े लोगों का मानना है कि इससे इनोवेशन की रफ्तार धीमी हो गई. अब उम्मीद की जा रही है कि CBDC और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर फोकस बढ़ेगा और क्रिप्टो टैक्स को लेकर कुछ राहत मिल सकती है, जिससे इस सेक्टर को नई जान मिले.
मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री

मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री भी खुद को नजरअंदाज महसूस करती रही. एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री यानी AiMeD ने अलग रेगुलेटरी बॉडी, जीएसटी दरों में सुधार और इनपुट टैक्स क्रेडिट की मांग रखी थी, लेकिन बजट में इन पर कोई ठोस चर्चा नहीं हुई. IVD-मेडटेक सेक्टर भी निराश रहा. अब उम्मीद है कि आने वाले बजट में हेल्थकेयर वर्कफोर्स को मजबूत करने के लिए फैकल्टी की भर्ती और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा निवेश किया जाएगा, ताकि इलाज की गुणवत्ता बेहतर हो सके.
शिक्षा के क्षेत्र में लक्ष्य से कम आवंटन
शिक्षा क्षेत्र को लेकर भी तस्वीर कुछ ऐसी ही रही. बजट में एजुकेशन के लिए 1.28 लाख करोड़ रुपये का आवंटन जरूर हुआ, जो पिछले साल से ज्यादा था, लेकिन यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उस लक्ष्य से काफी कम है जिसमें जीडीपी का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की बात कही गई है. स्किलिंग प्रोग्राम्स पर जीएसटी छूट की मांग भी पूरी नहीं हुई. अब उम्मीद की जा रही है कि 2026 में प्रोफेशनल अपस्किलिंग को टैक्स फ्री किया जा सकता है, जिससे युवाओं को नई स्किल सीखने में राहत मिले.
LTCG टैक्स में कटौती, इंडेक्सेशन बहाली
मिडिल क्लास को टैक्स में राहत की सबसे ज्यादा उम्मीद थी, लेकिन LTCG टैक्स में कटौती, इंडेक्सेशन की वापसी और इनकम टैक्स स्लैब में बदलाव जैसी मांगें अधूरी रह गईं. कैपिटल गेन्स टैक्स बढ़ने से निवेश पर भी असर पड़ा. अब चर्चा है कि आने वाले बजट में LTCG को 10 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है और बेसिक एग्जेम्प्शन लिमिट 3.5 लाख रुपये तक बढ़ सकती है, जिससे आम करदाता को सीधा फायदा मिलेगा.
MSME और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर

MSME और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए PLI स्कीम का दायरा जरूर बढ़ा, लेकिन छोटे कारोबारियों के लिए क्रेडिट गारंटी और नियमों की जटिलता कम करने पर खास ध्यान नहीं दिया गया. इससे छोटे उद्यमों को अभी भी फाइनेंस और कंप्लायंस में दिक्कतें झेलनी पड़ रही हैं.
जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी
कृषि क्षेत्र में भी जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारियां पर्याप्त नहीं मानी गईं. क्लाइमेट-रेजिलिएंट बीजों के लिए 100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया, लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि यह रकम काफी नहीं है. फसल सुरक्षा, मिट्टी की सेहत और जल प्रबंधन के लिए बड़े स्तर पर निवेश की जरूरत है. माइक्रो-इरिगेशन और टिकाऊ खेती पर अपेक्षित फोकस नहीं होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहा. इन तमाम अधूरी मांगों के चलते अर्थव्यवस्था में असंतुलन बढ़ा और विपक्ष ने इसे कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता देने वाला कदम बताया.
कैसा होना चाहिए 2026 का बजट?
विशेषज्ञ मानते हैं कि 2026 का बजट रोजगार, स्किलिंग और डिजिटल बदलाव पर केंद्रित होना चाहिए. डेलॉइट इंडिया की प्री-बजट रिपोर्ट में कहा गया है कि बजट को “विकसित भारत” के विजन से जोड़कर देखा जाना चाहिए. IDFC फर्स्ट बैंक की चीफ इकोनॉमिस्ट गौरा सेन गुप्ता का मानना है कि कैपेक्स को 12 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाया जाना चाहिए और फॉर्मल व इनफॉर्मल सेक्टर में रोजगार को प्रोत्साहन मिलना चाहिए. ICRA ने फिस्कल डेफिसिट को 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने की सलाह दी है.
इंडस्ट्री की मांग है कि PLI स्कीम को एआई, रोबोटिक्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स तक बढ़ाया जाए. रियल एस्टेट सेक्टर में अफोर्डेबल हाउसिंग की परिभाषा में बदलाव की भी बात हो रही है ताकि सस्टेनेबल ग्रोथ को बढ़ावा मिले. टेक सेक्टर में रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए बड़े फंड और IndiaAI मिशन पर जोर देने की जरूरत बताई जा रही है. TCS के CEO का कहना है कि आने वाले समय में एआई की मांग दस गुना तक बढ़ सकती है. वहीं फाइनेंशियल सेक्टर में इंश्योरेंस और टैक्स सुधारों को भी अहम माना जा रहा है.
बजट से आम आदमी की क्या है चाहत?
- आम आदमी की उम्मीदें ज्यादा सीधी और व्यावहारिक हैं. सोशल मीडिया और सर्वे बताते हैं कि लोग टैक्स राहत, रोजगार के अवसर और महंगाई पर नियंत्रण चाहते हैं. ज्यादातर लोग ऐसा बजट चाहते हैं जो मिडिल क्लास के लिए अनुकूल हो.
- लोगों की चाह है कि टैक्स कम हो ताकि हाथ में ज्यादा पैसा बचे. 10 लाख रुपये तक की कमाई पर टैक्स न लगे, LTCG टैक्स घटे और घर, इलाज व पढ़ाई पर ज्यादा छूट मिले, ऐसी उम्मीदें की जा रही हैं. इससे रोजमर्रा का खर्च संभालना आसान होगा और बचत भी बढ़ेगी.
- रोजगार और ग्रामीण विकास भी बड़ी प्राथमिकता है. लोग चाहते हैं कि नौकरियां बढ़ें, गांव मजबूत हों, किसानों को बेहतर MSP मिले और KCC लोन आसानी से उपलब्ध हो. युवा वर्ग बेहतर स्किल ट्रेनिंग और अच्छी नौकरियों की उम्मीद कर रहा है ताकि बेरोजगारी कम हो और आमदनी बढ़े.
- महंगाई पर नियंत्रण भी आम आदमी के लिए बेहद जरूरी मुद्दा है. अगर पेट्रोल-डीजल सस्ता होता है और जरूरी सामान की कीमतें काबू में रहती हैं तो घर का बजट संभालना आसान होगा. टैक्स कटौती के बाद लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा आएगा तो बाजार में खरीदारी बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी.
- इलाज और पढ़ाई लगातार महंगे होते जा रहे हैं, इसलिए हेल्थ और एजुकेशन पर ज्यादा निवेश की मांग भी जोर पकड़ रही है. मेडिकल सीटें बढ़ें, डॉक्टर और फैकल्टी की संख्या बढ़े, अस्पतालों और स्कूलों का इंफ्रास्ट्रक्चर सुधरे, ऐसी अपेक्षा की जा रही है. इससे गरीब और मिडिल क्लास परिवारों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी और आने वाली पीढ़ी का भविष्य ज्यादा सुरक्षित और मजबूत बन सकेगा.
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