ईरान और वेनेजुएला में एयर डिफेंस सिस्टम की नाकामी
फरवरी 2026 में अमेरिका और इज़रायल के जॉइंट के दौरान ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया. इन हमलों से बचाव के लिए तैनात चीन का HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम वैसा काम नहीं कर पाया, जिसकी उम्मीद थी. विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर हमलों के कारण रडार नेटवर्क बाधित हो गया, जिससे आने वाले टारगेट्स को ट्रैक करना मुश्किल हो गया. परिणामस्वरूप कई महत्वपूर्ण ठिकानों पर सटीक हमले संभव हो सके.
कुछ इसी तरह की स्थिति जनवरी 2026 में वेनेजुएला में देखने को मिली. वहां अमेरिकन स्पेशल फोर्सेस द्वारा चलाए गए एक अभियान के दौरान HQ-12 एयर डिफेंस सिस्टम और JY-27A रडार भी सही तरीके से काम करने में असफल रहे. इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और साइबर हमलों के कारण रडार नेटवर्क कमजोर पड़ गया और एयर डिफेंस एक्टिविटी बेहद सीमित रही.
भारत ने भी परख ली चीनी ताकत!
मई 2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान पाकिस्तान के पास मौजूद चीनी एयर डिफेंस सिस्टम HQ-9 और LY-80 भी चर्चा में आए. रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय लड़ाकू विमानों और लंबी दूरी की मिसाइलों को रोकने में ये सिस्टम फिसड्डी साबित हुए. PL-15 एयर-टू-एयर मिसाइल की चर्चा इसलिए हुई, क्योंकि वह टारगेट तक पहुंचे बिना जमीन पर गिर गई.
दूसरी ओर, जुलाई से दिसंबर 2025 के बीच थाईलैंड-कंबोडिया सीमा पर हुई झड़पों में कंबोडियाई सैनिकों द्वारा इस्तेमाल की जा रही टाइप-80 और टाइप-95 मशीनगनों में लगातार फायरिंग के दौरान तकनीकी दिक्कतें सामने आईं. कई रिपोर्टों में बैरल ओवरहीटिंग और जाम होने की समस्या का जिक्र किया गया, जिससे जमीनी लड़ाई के दौरान सैनिकों को कठिनाई हुई.
क्यों सामने आ रही हैं ये तकनीकी चुनौतियां?
विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाओं के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं. रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, चीन ने कई हथियार प्रणालियों में विदेशी डिजाइनों से प्रेरित तकनीक अपनाई है. हालांकि डिजाइन की नकल करना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन जटिल सॉफ्टवेयर और युद्धक्षेत्र में काम करने वाली एल्गोरिदमिक तकनीक को पूरी तरह दोहराना बेहद कठिन होता है. इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे आधुनिक युद्धक्षेत्र में यही अंतर सामने आ सकता है.
दूसरा कारण यह भी माना जाता है कि चीन ने पिछले कई दशकों में बड़े पैमाने पर युद्ध का अनुभव नहीं किया है. इसलिए कई सिस्टम प्रयोगशाला और सीमित परीक्षणों में सफल दिखते हैं, लेकिन वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में उनका प्रदर्शन अलग हो सकता है.
कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में चीन की रक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार को भी एक बड़ा कारण बताया गया है. हाल के वर्षों में चीन के कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है. आरोप लगे कि कुछ परियोजनाओं में गुणवत्ता नियंत्रण कमजोर रहा और उत्पादन प्रक्रिया में गंभीर खामियां रह गईं.
भारत की रणनीति कारगर कैसे?
चीन और भारत के हथियारों में क्या फर्क है?
भारत की रक्षा रणनीति चीन से बिल्कुल अलग है. हमारा फोकस हथियारों की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, विश्वसनीयता और युद्ध में परखे जाने पर है. चीन मुख्य रूप से मास प्रोडक्शन पर जोर देता है, ताकि दुनिया में सबसे ज्यादा मिसाइलें, रडार और फाइटर जेट्स दिखाकर संख्या के खेल से दुश्मन को डराया जा सके, लेकिन इस प्रक्रिया में क्वालिटी से समझौता भी हो रहा है. इसके विपरीत, भारत कभी संख्या का शो-ऑफ नहीं करता. भारतीय सेना और रक्षा वैज्ञानिकों का पूरा ध्यान हथियारों को 100% भरोसेमंद बनाने पर है. भारत के हथियार लैबोरेटरी में नहीं, बल्कि सियाचिन की कड़कड़ी ठंड से लेकर राजस्थान की 50 डिग्री से अधिक गर्मी तक वास्तविक परिस्थितियों में परखे जाते हैं.
भारत का डिफेंस सिस्टम अभेद्य कैसे?
भारत का सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र उसका हाइब्रिड और मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस नेटवर्क है, जिसे रक्षा विशेषज्ञ “अभेद्य शील्ड” कहते हैं. यह डिफेंस नेटवर्क रूसी, इज़रायली और स्वदेशी तकनीकों का अनोखा मिश्रण है, जिसमें लंबी दूरी के लिए रूसी S-400 (सुदर्शन चक्र) और भारत की बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) सिस्टम सबसे बाहरी परत बनाते हैं. अगर कोई खतरा इस परत से बच भी जाए, तो मध्यम दूरी पर इज़रायली Barak-8 (MRSAM) और Akash सिस्टम उसे रोकते हैं.
भारतीय सिस्टम को जाम करना मुश्किल कैसे?
भारत के हथियारों में पास की दूरी के लिए QRSAM, Akash-NG और अन्य VSHORAD सिस्टम अंतिम सुरक्षा प्रदान करते हैं. इस हाइब्रिड डिजाइन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सभी सिस्टम्स के सॉफ्टवेयर, एल्गोरिदम और काम करने का तरीका अलग-अलग है, इसलिए दुश्मन का इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) या जैमिंग अगर एक सिस्टम को प्रभावित भी कर ले, तो अन्य तुरंत एक्टिव हो जाते हैं. एक साथ रूसी, इज़रायली और भारतीय कोड को हैक या जैम करना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन है.
क्यों कॉपी नहीं हो सकते भारतीय वेपन?
DRDO के नेतृत्व में भारत अब स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, रडार (जैसे Arudhra) और अन्य सिस्टम विकसित कर रहा है, जो पूरी तरह घरेलू हैं और किसी विदेशी ब्लूप्रिंट पर आधारित नहीं. ये सिस्टम कॉपी-प्रूफ हैं, जिससे चीन या कोई अन्य देश इन्हें रिवर्स इंजीनियरिंग नहीं कर सकता. चीन के ज्यादातर सिस्टम रिवर्स इंजीनियरिंग पर आधारित होने के कारण एक कोड समझ आ जाने पर पूरा नेटवर्क कमजोर हो जाता है, जबकि भारत ने इस लूप होल को पूरी तरह बंद कर दिया है.
किन-किन देशों में भारतीय हथियारों का निर्यात?
वैश्विक स्तर पर भी भारत की यह रणनीति फल दे रही है. भारत के रक्षा निर्यात ने रिकॉर्ड स्तर छुआ है. FY 2024-25 में निर्यात 23,622 करोड़ तक पहुंच गए, जो पिछले दशक में 30 गुना से अधिक वृद्धि दर्शाता है. फिलीपींस ब्रह्मोस मिसाइलें ले रहा है (2022 में $375 मिलियन का सौदा हुआ है), आर्मेनिया Akash और Pinaka सिस्टम खरीद रहा है, जबकि अन्य देश जैसे UAE, वियतनाम और इंडोनेशिया में भी रुचि बढ़ रही है.
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