28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमला किया. इसके जवाब में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्गों में से अहम होर्मुज स्ट्रेट को जहाज़ों के लिए खतरनाक घोषित कर दिया. यह वही मार्ग है जहां से वैश्विक ऊर्जा सप्लाई का बड़ा हिस्सा गुजरता है.
इस घटना के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में तुरंत हलचल शुरू हो गई. संयुक्त समुद्री सूचना केंद्र (JMIC) के आंकड़ों के अनुसार सामान्य दिनों में जहां लगभग 138 जहाज़ रोज इस मार्ग से गुजरते थे, वहीं संकट के बाद जहाज़ों की आवाजाही लगभग 94% तक गिर गई. कई टैंकर समुद्र में ही खड़े रह गए और ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने लगी.
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में LNG की सप्लाई इसी समुद्री मार्ग से होती है. इसलिए इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ना स्वाभाविक है.
कतर से लगा बड़ा झटका
ऊर्जा संकट को और गहरा तब झटका लगा जब 2 मार्च को ड्रोन हमले के बाद कतर के Ras Laffan LNG टर्मिनल का उत्पादन रोकना पड़ा. यह दुनिया का सबसे बड़ा LNG निर्यात केंद्र माना जाता है और इसकी सालाना उत्पादन क्षमता लगभग 7.7 करोड़ टन है.
भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर चिंताजनक है क्योंकि देश की LNG आपूर्ति का बड़ा हिस्सा कतर से आता है. आंकड़ों के अनुसार भारत हर साल करीब 2.7 करोड़ टन LNG कतर से आयात करता है, जो भारत के कुल LNG आयात का लगभग 40% है. भारत की कुल गैस जरूरत का करीब आधा हिस्सा आयात से पूरा होता है और उस आयात का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है.
इस सप्लाई बाधा का असर तुरंत अंतरराष्ट्रीय बाजार में दिखाई दिया. स्पॉट LNG कीमतें लगभग दोगुनी होकर $10–12 प्रति MMBtu से बढ़कर $24–25 प्रति MMBtu तक पहुंच गईं.
अडानी टोटल गैस का फैसला
वैश्विक गैस संकट का असर भारत में सबसे पहले औद्योगिक गैस बाजार में दिखाई दिया. अडानी टोटल गैस लिमिटेड (ATGL) ने अपने औद्योगिक ग्राहकों के लिए गैस की कीमतों में भारी वृद्धि की घोषणा की.
कंपनी के नोटिस के अनुसार पहले औद्योगिक अतिरिक्त गैस की कीमत लगभग ₹40 प्रति SCM थी, जिसे बढ़ाकर ₹119 प्रति SCM कर दिया गया है. यानी कीमतों में लगभग 197 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. यह नई दर उन ग्राहकों पर लागू होगी जो अपनी अनुबंधित दैनिक गैस मात्रा से 40% से ज्यादा गैस का उपयोग करते हैं.
कंपनी का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के कारण LNG सप्लाई प्रभावित हुई है, जिसके चलते उसे अपस्ट्रीम गैस में कटौती का सामना करना पड़ा. हालांकि अभी CNG और घरेलू PNG उपभोक्ताओं के लिए कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है क्योंकि उनकी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा घरेलू गैस से आता है.
किन उद्योगों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर
भारत में प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा उद्योगों में इस्तेमाल होता है. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार भारत की कुल गैस खपत का 70% से अधिक हिस्सा औद्योगिक क्षेत्र में जाता है.
गैस महंगी होने से कई उद्योग प्रभावित हो सकते हैं:
- उर्वरक इंडस्ट्री: अमोनिया और यूरिया उत्पादन की लागत बढ़ेगी
- पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री: प्लास्टिक और रसायनों की कीमतें बढ़ सकती हैं
- सीमेंट और सिरेमिक इंडस्ट्री: निर्माण सामग्री महंगी होगी
- स्टील और धातु इंडस्ट्री: उत्पादन लागत बढ़ेगी
- बिजली उत्पादन: गैस आधारित बिजली महंगी हो सकती है
- टेक्सटाइल और ग्लास उद्योग: उत्पादन लागत में वृद्धि
IEEFA के अनुसार भारत के उर्वरक क्षेत्र में LNG का उपयोग सबसे ज्यादा होता है. 2022-23 में गैस की कीमतें बढ़ने पर सरकार को उर्वरक सब्सिडी पर लगभग $30.5 अरब (करीब ₹2.5 लाख करोड़) खर्च करना पड़ा था.
आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा
ऊर्जा की कीमतें बढ़ने का असर धीरे-धीरे पूरी सप्लाई चेन में फैलता है. इससे कई रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं. संभावित असर:
- खाद्यान्न और सब्जियां महंगी हो सकती हैं
- प्लास्टिक और पैकेजिंग उत्पाद महंगे हो सकते हैं
- बिजली बिल बढ़ सकते हैं
- ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ सकती है
- सीमेंट और स्टील महंगे होने से घर बनाना महंगा हो सकता है
इसके साथ ही Brent crude की कीमत भी बढ़कर लगभग $87.66 प्रति बैरल तक पहुंच गई है और विश्लेषकों का अनुमान है कि यह $100-130 प्रति बैरल तक जा सकती है.
सरकार और एजेंसियों की प्रतिक्रिया
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल के अनुसार फिलहाल वैश्विक तेल भंडार जारी करने की जरूरत नहीं है क्योंकि समस्या सप्लाई की कमी से ज्यादा लॉजिस्टिक्स बाधा की है.
भारत सरकार भी वैकल्पिक LNG स्रोतों की तलाश कर रही है, जिनमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिम अफ्रीका शामिल हैं. हालांकि जब तक होर्मुज मार्ग पूरी तरह सुरक्षित नहीं होता, तब तक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है.
अगर यह संकट लंबा खिंचता है तो उद्योगों की लागत बढ़ेगी, सरकार का सब्सिडी बोझ बढ़ेगा और अंततः इसका असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा. इसलिए आने वाले कुछ हफ्ते भारत और वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं.
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