पिछले कुछ हफ्तों में गिग वर्कर्स की सुरक्षा और उनके कामकाजी हालातों को लेकर देश में एक बड़ी बहस छिड़ी है. सरकार द्वारा नया श्रम संहिता (लेबर कोड) लाने की तैयारी और क्रिसमस-न्यू ईयर के दौरान गिग वर्कर्स यूनियनों की हड़ताल ने इस मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया. सरकार ने ’10-मिनट डिलीवरी’ के विज्ञापनों पर आपत्ति जताई, जिसे राइडर्स की सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम माना गया. लेकिन, जैसा कि सुमित कहता है, “यह तो सिर्फ घोषणा है.” कंपनियों ने विज्ञापनों से समय की सीमा हटा दी, लेकिन उनके एल्गोरिद्म और परफॉर्मेंस मेट्रिक्स आज भी उसी ‘सुपरफास्ट’ गति पर चल रहे हैं. राइडर के ऐप पर चलने वाली अदृश्य घड़ी आज भी उसे उतनी ही तेजी से भागने पर मजबूर करती है जितनी पहले करती थी.
क्या बदले हालात?
हकीकत में, ‘क्विक कॉमर्स’ का पूरा मॉडल ही ‘तेजी’ पर टिका है. यदि डिलीवरी धीमी हुई, तो बिज़नेस मॉडल खतरे में पड़ जाएगा. यही कारण है कि कंपनियों ने ’10-मिनट डिलीवरी’ का टैग तो हटा लिया है, लेकिन काम करने का तरीका वही है. सुमित जैसे राइडर्स के लिए यह एक ऐसी दौड़ है जिसका कोई अंत नहीं है. जब तक ग्राहकों की मानसिकता और कंपनियों के इंसेंटिव स्ट्रक्चर में बदलाव नहीं आता, तब तक डिलीवरी बॉय की यह घातक दौड़ इसी तरह जारी रहेगी.
हर किलोमीटर के मिलते हैं 14 रुपये
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक डिलीवरी राइडर की कमाई का गणित बेहद पेचीदा और थका देने वाला है. सुमित जेप्टो के लिए काम करते हैं. उनके मुताबिक, उसे प्रति ऑर्डर औसतन ₹14 मिलते हैं. दिल्ली-एनसीआर जैसे महंगे शहरों में सम्मानजनक जीवन जीने के लिए एक राइडर को महीने के ₹25,000 से ₹30,000 कमाने होते हैं. इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए उसे दिन में कम से कम 30 से 35 डिलीवरी करनी पड़ती हैं. इसका सीधा मतलब है कि बिना किसी छुट्टी के रोजाना 10 से 12 घंटे लगातार काम करना पड़ता है. अगर एक भी ऑर्डर में देरी होती है, तो उसका असर पूरे दिन की कमाई और आने वाले ऑर्डर्स पर पड़ता है.
ग्राहकों की उम्मीदें और ‘टाइम’ का दबाव
भले ही कंपनियों ने 10 मिनट का आधिकारिक वादा वापस ले लिया हो, लेकिन ग्राहकों के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है. गुरुग्राम के एक डिलीवरी राइडर ध्रुव राजपूत बताते हैं कि लोग अब सुपरफास्ट डिलीवरी के ‘आदी’ हो चुके हैं. यदि ट्रैफिक जाम या किसी तकनीकी खराबी के कारण देरी होती है तो ग्राहक अक्सर अपना गुस्सा राइडर पर निकालते हैं. कैश ऑन डिलीवरी के मामलों में तो स्थिति और भी खराब हो जाती है. कई बार ग्राहक देर होने पर पैसे देने से मना कर देते हैं या ऑर्डर लेने से इनकार कर देते हैं.
आईडी ब्लॉक होने का डर
राइडर्स के लिए सड़क दुर्घटनाओं से भी बड़ा डर अपनी आईडी ब्लॉक होने का है. ऐप का एल्गोरिद्म इतना कठोर है कि यदि कोई राइडर किसी आपातकालीन स्थिति में भी कुछ ऑर्डर रिजेक्ट कर देता है तो उसकी आईडी अस्थायी या स्थायी रूप से ब्लॉक की जा सकती है. दिल्ली में काम करने वाले दीपक का कहना है कि एक ऑर्डर रिजेक्ट करने पर न केवल उस समय की कमाई जाती है, बल्कि पेनल्टी के रूप में ₹5 से ₹10 की कटौती भी हो सकती है.
जान पर भारी ‘टाइम’
समय बचाने के दबाव में राइडर्स अक्सर अपनी जान जोखिम में डालते हैं. सड़क पर गलत दिशा (Wrong side) में गाड़ी चलाना, रेड लाइट जंप करना या प्रतिबंधित कट से मुड़ना उनकी मजबूरी बन जाती है. नोएडा के एक राइडर ने बताया कि दिसंबर 2025 में उसने अपनी मेहनत की कमाई में से ₹6,000 केवल ट्रैफिक चालान भरने में गंवा दिए. विडंबना यह है कि जिस ‘समय’ को बचाने के लिए वे नियम तोड़ते हैं, उसका पूरा मुनाफा कंपनी को जाता है, लेकिन पकड़े जाने पर चालान का सारा बोझ अकेले राइडर के कंधों पर होता है.
भारी बैग मुसीबत
डिलीवरी के काम में सिर्फ समय ही चुनौती नहीं है, बल्कि सामान का वज़न भी एक बड़ी समस्या है. राइडर्स को अक्सर 25-30 किलो के भारी बैग अपनी पीठ पर लादकर कई मंजिलें चढ़नी पड़ती हैं. ब्लिंकिट के राइडर राजू का कहना है कि लगातार भारी वजन उठाने और सीढ़ियां चढ़ने से उनके घुटनों और पीठ में दर्द रहने लगा है. गिग वर्कर्स की मांग है कि सरकार को सामान के वजन की एक स्पष्ट सीमा तय करनी चाहिए, ताकि उनके शरीर पर पड़ने वाले इस दीर्घकालिक दुष्प्रभाव को रोका जा सके.
बीमा तो है पर मिलता किसी-किसी को
हैरानी की बात यह है कि अधिकांश राइडर्स के ऐप में बीमा कवर ‘एक्टिव’ दिखाई देता है, जिसमें दुर्घटना बीमा और स्वास्थ्य कवरेज शामिल होता है. लेकिन हकीकत में, लगभग किसी भी राइडर को यह नहीं पता कि इस बीमा का लाभ कैसे लिया जाए. तकनीकी जटिलताओं और जानकारी के अभाव के कारण दुर्घटना के समय वे क्लेम नहीं कर पाते. एक राइडर ने बताया कि उसके दोस्त का पैर टूटने के बावजूद वह बीमा राशि हासिल नहीं कर सका क्योंकि कंपनी की ओर से उसे प्रक्रिया समझाने वाला कोई नहीं था.
क्या नया लेबर कोड बदलेगा हालात
भारत सरकार नया लेबर कोड लेकर आई है, जिसमें गिग वर्कर्स के लिए कुछ सुरक्षा उपायों का जिक्र है. हालांकि, इन राइडर्स को इस बात की जानकारी तो है कि कुछ नया नियम आया है, लेकिन इसके बारीक विवरणों से वे पूरी तरह अनजान हैं. राइडर्स की मांग है कि सरकार और कंपनियों को मिलकर जागरूकता शिविर लगाने चाहिए. उन्हें न केवल उनके अधिकारों के बारे में बताया जाना चाहिए, बल्कि बीमा क्लेम करने की तकनीकी प्रक्रिया, वित्तीय साक्षरता और सड़क सुरक्षा पर भी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए.
Discover more from Business News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.