भारत टैक्स को लॉन्च करने का मकसद शून्य कमीशन और सदस्य-स्वामित्व वाले मॉडल को पेश करना है. भारत टैक्सी वादा करती है कि इसे अपनाने वालों को वह गिग इकॉनमी को मुनाफाखोर कॉरपोरेट सिस्टम से बदलकर एक टिकाऊ और ड्राइवर-केंद्रित सहकारी संस्था (कोऑपरेटिव) बनाएगी. भारत टैक्सी न सिर्फ इससे जुड़कर कैब चलाने वालों को फायदा देगी, बल्कि इसमें सफर करने वालों के लिए भी यह ओला-उबर के मुकाबले सस्ता पड़ेगा. यह कोऑपरेटिव कंपनी होगी तो इसमें कॉरपोरेट जैसे पंगे नहीं होंगे.
क्या है अमूल की कारोबारी रणनीति
अमूल सिर्फ मक्खन या दूध का ब्रांड नहीं है. यह उस ताकत का प्रतीक है, जब लाखों छोटे खिलाड़ी मिलकर बड़े दिग्गजों को चुनौती देते हैं. इसी बिजनेस मॉडल को कोऑपरेटिव कहा जाता है. अब एक नया नाम ‘भारत टैक्सी’ इसी राह पर चलकर राइड-हेलिंग सर्विसेज की दुनिया में अमूल बनने की कोशिश कर रहा है, जिसमें ड्राइवरों को पूरी ताकत दी जा रही है. देश के कुछ चुनिंदा इलाकों में इसका पायलट प्रोजेक्ट काफी पहले शुरू हो चुका था. अब इसे पूरे देश में शुरू किया गया है और उम्मीद की जा रही है कि यह भी अमूल की तरह कामयाब कोऑपरेटिव बन जाएगी.
कैसे काम करती है भारत टैक्सी
भारत टैक्सी का बिजनेस मॉडल बहुत सिंपल है. पहली बात तो यह एक सहकारी पहल है, ठीक वैसे ही जैसे अमूल. इसका मतलब है कि इसके पीछे कोई लाभ कमाने वाली निजी संस्था नहीं है. इसके बजाय, यह हजारों ड्राइवरों की सेवा है, जिन्होंने मिलकर एक सहकारी संस्था बनाई है. यह उन ड्राइवरों के लिए भी अच्छी खबर है जो इससे जुड़े हैं और उन ग्राहकों के लिए भी जो इस सेवा का इस्तेमाल करते हैं. इस तरह, यह बिजनेस मॉडल कैब ड्राइवर्स के साथ सफर करने वाले आम आदमी को भी फायदा देगी.
भारत टैक्सी के पीछे किसका दिमाग
भारत टैक्सी की कमान नई दिल्ली स्थित सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड के हाथ में है. इसकी लीडरशिप पहले से ही ‘अमूल-हैवी’ है. इसमें और भी अमूल का तड़का है, क्योंकि अमूल के मैनेजिंग डायरेक्टर जयेन मेहता इसके चेयरमैन हैं. यह सेवा भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय द्वारा समर्थित है और नेशनल ई-गवर्नेंस डिवीजन (NeGD) के साथ जुड़ी हुई है. इन नामों से भले ही विश्वसनीयता मिलती हो, लेकिन असली सितारे तो खुद ड्राइवर हैं. वे ही इस बिजनेस के मालिक हैं, ठीक वैसे ही जैसे छोटे-छोटे डेयरी संचालक मिलकर अमूल को ताकत देते हैं.
ओला-उबर से कैसे अलग होगी यह कंपनी
प्राइवेट कंपनियों और भविष्य के संभावित प्रतिस्पर्धियों जैसे उबर और ओला के मुकाबले, भारत टैक्सी जीरो-कमीशन मॉडल पर काम करती है. इससे ड्राइवर अपनी कमाई का लगभग पूरा हिस्सा घर ले जा सकते हैं. फिलहाल कोई निश्चित आंकड़ा नहीं बताया जा सकता, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक यह हिस्सा 80 से 100 फीसदी के बीच हो सकता है. हालांकि, ऐसा माना जा रहा है कि कमाई का कुछ हिस्सा संगठन के सुचारू संचालन के लिए देना पड़ सकता है. दूसरे शब्दों में, ड्राइवरों को सहकारी संस्था को रोजाना या महीने का कुछ पैसा प्लेटफॉर्म शुल्क के रूप में देना पड़ सकता है. ओला, उबर और रैपिडो जैसी प्रतिस्पर्धी सेवाओं के ड्राइवर अक्सर शिकायत करते हैं कि ईंधन, कार की ईएमआई और प्लेटफॉर्म द्वारा लिए जाने वाले 20-30 फीसदी कमीशन के बाद उनके पास बहुत कम बचता है.
ड्राइवर्स को होगा फैसले लेने का अधिकार
भारत टैक्सी की खूबियां सिर्फ यहीं समाप्त नहीं होती. इससे जुड़ने वाले ड्राइवर सिर्फ पार्टनर नहीं हैं, बल्कि उन्हें फैसले लेने का अधिकार भी है. बताया जा रहा है कि सहकार टैक्सी के गवर्निंग बोर्ड में चुने हुए ड्राइवर प्रतिनिधि भी शामिल होंगे. यात्रियों को ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं में बारिश या भीड़ के समय किराए में अचानक बढ़ोतरी यानी सर्ज प्राइसिंग से भी राहत मिलेगी. अगर आप किसी जगह जैसे घर और ऑफिस, रोजाना जाते हैं तो संभावना है कि आपको हर दिन लगभग एक जैसा किराया देना पड़ेगा, न कि कभी-कभी अचानक बहुत ज्यादा.
सफल होने का क्या है फॉर्मूला
भारत टैक्सी को अमूल मॉडल की तरह बनाया जा रहा है, अमूल इसलिए सफल है, क्योंकि उसमें भरोसा और मात्रा दोनों हैं. भारत टैक्सी को ऊबर या ओला से ज्यादा मुनाफा कमाने की जरूरत नहीं है. उसे सिर्फ ड्राइवर के लिए ज्यादा टिकाऊ बनना है. मान लीजिए अगर कोई ड्राइवर रोज 500 रुपये ज्यादा कमा लेता है, क्योंकि कोई कमीशन नहीं है, तो उसके इस ऐप पर बने रहने की संभावना ज्यादा है. अगर कोई यात्री 250 रुपये बचा लेता है, क्योंकि कोई सर्ज नहीं है, तो वह भी इस ऐप का इस्तेमाल करेगा और दूसरों को भी इसकी सलाह देगा. फिर भी मौजूदा कंपनियों का मुकाबला करने के लिए सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव ने वही बैकएंड तकनीक चुनी है जो ओएनडीसी समर्थित नम्मा यात्री ऐप को चलाती है.
न्यूयॉर्क में चल रहीं कोऑपरेटिव टैक्सी
भारत टैक्सी जैसे कोऑपरेटिव मॉडल पहले से ही दुनिया में चल रहे हैं. इसका सफल उदाहरण न्यूयॉर्क का है. वहां ड्राइवर्स कोऑपरेटिव 2021 से Uber और Lyft जैसी बड़ी राइड-हेलिंग कंपनियों के विकल्प के रूप में काम कर रही है. बड़ी टेक कंपनियों के भारी मार्केटिंग बजट जैसी चुनौतियों के बावजूद, यह आज भी अमेरिका में अपनी तरह की सबसे बड़ी कोऑपरेटिव टैक्सी बनी हुई है. दूसरा, गोवा के टैक्सी मालिक हैं, जो भले ही आधिकारिक रूप से कोऑपरेटिव न हों, लेकिन जब बात यात्रियों को सेवा देने की आती है, तो वे आपस में जरूर सहयोग करते हैं. गोवा की टैक्सी यूनियनें एक मजबूत लॉबी की तरह काम करती हैं, जो Uber और Ola जैसे बड़े एग्रीगेटर्स को राज्य में काम करने से रोकती हैं. हालांकि, इसका खामियाजा यात्रियों को भुगतना पड़ता है, जिन्हें कम दूरी के लिए भी मोटे पैसे देने पड़ते हैं.
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