ब्लिंकिट ने 110 करोड़ का, जेप्टो 1250 करोड़ का और इंस्टामार्ट 1000 करोड़ का नुकसान दर्ज किया है. इसी बीच पिछले साल देशभर में 2 लाख से ज्यादा छोटे किराना और स्थानीय स्टोर बंद हो गए. सालों से मुनाफे में चल रहे ये लोकल बिजनेस दांव पर हैं, जबकि करोड़ों का नुकसान उठाने वाले ऐप्स तेजी से ग्रो कर रहे हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सब कंपनियां घाटे में हैं और छोटे स्टोर बंद हो रहे हैं, तो आखिर मुनाफा किसका बन रहा है?
किराना स्टोर और क्विक कॉमर्स ऐप्स
किराना स्टोर 30 साल से ज्यादा समय से मुनाफे में चलते आए हैं. वो रियल कैश मार्जिन पर काम करते हैं, कम कर्ज, असली बिजनेस, लेकिन क्विक कॉमर्स ऐप्स इन्वेस्टर के पैसे से चलते हैं. हर साल हजारों करोड़ का लॉस, लेकिन वैल्यूएशन अरबों में पहुंच रही है. ये प्रॉफिट का खेल नहीं, वैल्यूएशन का खेल है. वेंचर कैपिटलिस्ट यानी वीसी पहले एंटर करते हैं, स्टोरी पंप करते हैं, फ्यूचर वैल्यूएशन पर फोकस करते हैं. 1 बिलियन से 5 बिलियन तक पहुंचाकर अगले इन्वेस्टर को बेचते हैं या आईपीओ से निकलते हैं. इससे ये भी बात सामने निकलर आई है कि हाइप से पैसा बनता है, बिजनेस से नहीं.
मकान मालिक की होती है कमाई
दूसरे नंबर पर मकान मालिक आते हैं. 10 मिनट डिलीवरी के लिए डार्क स्टोर रेसिडेंशियल एरिया में चाहिए. मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों में कमर्शियल रेंट 40-50% बढ़ गए. स्पेस के लिए बिडिंग वॉर चल रही है. फ्री डिलीवरी का पैसा चुपके से इनके किराए को सब्सिडी दे रहा है. ऐप्स लॉस उठा रहे हैं लेकिन लैंडलॉर्ड्स अच्छी कमाई कर रहे हैं.
एड एजेंसीज छाप रही हैं पैसे
तीसरे नंबर पर कमाई करने वालों में एड एजेंसीज या ऐप्स शामिल हैं. ग्रॉसरी बेचने से पैसा नहीं, मार्केटिंग से बनता है. ऐप्स स्क्रीन स्पेस बेच रहे हैं. ब्रांड्स लिस्टिंग फीस देते हैं ताकि उनका प्रोडक्ट सर्च में टॉप पर आए. कोला का 30 मिली पैकेट दिखाने के लिए अलग-अलग ब्रांड ज्यादा पैसे देते हैं. ऐप्स डिलीवरी मार्जिन से कम कमाते हैं लेकिन एड से ज्यादा. ये एडवरटाइजिंग कंपनियां हैं जो ग्रॉसरी डिलीवर करती हैं.
बढ़ रही है कैश बर्निंग मोनोपॉली
असली हकीकत ये है कि हम सस्टेनेबल सिस्टम को छोड़कर कैश बर्निंग मोनोपॉली की तरफ जा रहे हैं. आज कॉम्पिटिशन है तो डिस्काउंट मिलते हैं, 15 रुपये में धनिया. लेकिन कल जब मोनोपॉली बनेगी तो सर्ज प्राइसिंग आएगी. डिस्काउंट खत्म हो जाएगा और कीमतें बढ़ेंगी. कंज्यूमर आज जीत रहा है, लेकिन कल रियल प्राइस चुकाएगा. किराना स्टोर बंद हो रहे हैं, लोकल इकोनॉमी प्रभावित हो रही है. हमें क्विक कॉमर्स में ग्रोथ तो दिख रही है लेकिन उसके पीछे कितना लॉस और कितने लोग प्रभावित हैं ये साफ नहीं हो पा रहा है. इससे छोटे बिजनेस और आम आदमी पर असर पड़ रहा है. ये देखना अभी बाकि है कि क्या ये मॉडल स्टेबल होगा, या नहीं. लेकिन अभी ये अजीब खेल चल रहा है जहां लॉस में चलने वाले बढ़ रहे हैं और प्रॉफिटेबल वाले बंद हो रहे हैं.
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