बजट 2026 की सबसे बड़ी चुनौती नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ को संभालकर रखना है क्योंकि देश में इन्फ्लेशन बहुत कम स्तर पर बना हुआ है. रियल जीडीपी ग्रोथ मजबूत दिख रही है लेकिन कम महंगाई की वजह से नॉमिनल जीडीपी उम्मीद से नीचे रहने का अनुमान है. इसका सीधा असर सरकार के टैक्स कलेक्शन, रेवेन्यू ग्रोथ और फिस्कल डेफिसिट टारगेट्स पर पड़ सकता है. ऐसे में सरकार के सामने कैपेक्स बढ़ाने और फिस्कल डिसिप्लिन बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की बड़ी परीक्षा होगी.
कम इन्फ्लेशन का एक पॉजिटिव पहलू यह है कि उपभोक्ताओं पर महंगाई का दबाव कम है और रियल इनकम में सुधार हो रहा है. लेकिन दूसरी तरफ यही लो इन्फ्लेशन सरकार के लिए चुनौती बन रहा है क्योंकि नॉमिनल जीडीपी कम होने से टैक्स कलेक्शन और कुल रेवेन्यू ग्रोथ पर असर पड़ता है. इससे बजट डेफिसिट टारगेट्स हासिल करना और विकास योजनाओं के लिए जरूरी फंड जुटाना ज्यादा कठिन हो सकता है.
नॉमिनल जीडीपी स्लो होने से क्यों बढ़ी चिंता
रिपोर्ट में कहा गया है कि नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ सरकार की फाइनेंशियल प्लानिंग का आधार होती है. जब नॉमिनल जीडीपी धीमी होती है तो जीएसटी और डायरेक्ट टैक्स से मिलने वाला रेवेन्यू भी उम्मीद से कम रह सकता है. इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार के पास फिस्कल स्पेस सीमित हो जाएगा. ऐसे में इंफ्रास्ट्रक्चर कैपेक्स बढ़ाने और सब्सिडी जैसी जरूरी योजनाओं को जारी रखने के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा.
बजट 2026 में सरकार का संभावित फोकस
सीएनबीसी टीवी18 की रिपोर्ट के अनुसार सरकार कैपिटल एक्सपेंडिचर को बनाए रखने की कोशिश करेगी क्योंकि यही ग्रोथ का बड़ा इंजन माना जा रहा है. साथ ही फिस्कल डेफिसिट को जीडीपी के चार दशमलव पांच प्रतिशत से नीचे रखने का लक्ष्य भी प्राथमिकता रहेगा. रूरल डिमांड और कंज्यूम्पशन को सपोर्ट करने वाली योजनाओं पर भी फोकस बना रह सकता है. वहीं इनकम टैक्स स्लैब और कॉरपोरेट टैक्स में किसी बड़े बदलाव की संभावना कम बताई गई है.
रियल जीडीपी मजबूत लेकिन इन्फ्लेशन कंट्रोल में
रिपोर्ट के मुताबिक रिजर्व बैंक और सरकार दोनों वित्त वर्ष 2026 में रियल जीडीपी ग्रोथ करीब सात प्रतिशत रहने का अनुमान दे रहे हैं. इन्फ्लेशन तीन दशमलव पांच से चार प्रतिशत की रेंज में रह सकता है जो रिजर्व बैंक के चार प्रतिशत टारगेट के करीब है. हालांकि ग्लोबल फैक्टर्स जैसे अमेरिका के टैरिफ पॉलिसी और चीन की स्लो ग्रोथ से भारत के एक्सपोर्ट पर दबाव रह सकता है.
एक्सपर्ट्स की राय क्या कहती है
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि लो इन्फ्लेशन से कंज्यूमर की रियल इनकम बढ़ रही है जिससे डिमांड को सपोर्ट मिलेगा. लेकिन नॉमिनल जीडीपी स्लो होने से सरकार की रेवेन्यू ग्रोथ पर ब्रेक लग सकता है. अगर रेवेन्यू उम्मीद से कम रहा तो कैपेक्स कटौती का खतरा भी बन सकता है. इसलिए सरकार को फिस्कल कंसॉलिडेशन और ग्रोथ सपोर्ट के बीच स्मार्ट बैलेंस बनाना होगा.
मार्केट पर असर
लो इन्फ्लेशन और भविष्य में रेट कट की उम्मीद से बॉन्ड यील्ड्स में नरमी देखी जा रही है. बजट से पहले शेयर बाजार में भी कैपेक्स से जुड़े सेक्टर्स पर निवेशकों की नजर बनी हुई है. बाजार यह देखना चाहता है कि सरकार ग्रोथ को सपोर्ट करने के लिए कितनी मजबूत कैपेक्स स्ट्रैटेजी पेश करती है.
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जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
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