बजट 2026 को लेकर व्यक्तिगत करदाताओं में एक बार फिर उम्मीदों की लहर है. इस विषय पर केपीएमजी इंडिया में पार्टनर और नेशनल हेड (टैक्स ग्लोबल मोबिलिटी सर्विसेज) पारिजाद सिरवाला ने कहा कि हर बजट से पहले करदाताओं की एक ‘विशलिस्ट’ होती है, लेकिन इस बार हालात थोड़े अलग हैं. वैश्विक अनिश्चितता, बाजारों में उतार-चढ़ाव, टैरिफ में बदलाव और रुपये की कमजोरी जैसे मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पिछले साल ही व्यक्तिगत टैक्स ढांचे और कैपिटल गेन में बड़े बदलाव हो चुके हैं, इसलिए इस बजट से बहुत बड़े टैक्स सुधार की उम्मीद शायद व्यावहारिक नहीं होगी.
सबसे बड़ी उम्मीद स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ने की
इसके बावजूद कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर करदाता राहत की आस लगाए बैठे हैं. पारिजाद सिरवाला के मुताबिक सबसे बड़ी उम्मीद स्टैंडर्ड डिडक्शन को बढ़ाने की है. नए टैक्स सिस्टम में सरकार का झुकाव साफ दिखता है और अगर इसमें स्टैंडर्ड डिडक्शन की सीमा और बढ़ाई जाती है, तो इससे घरेलू बजट को सीधी राहत मिलेगी. दूसरी अहम मांग इलेक्ट्रिक व्हीकल से जुड़े परक्विजिट वैल्यूएशन नियमों को लेकर है. ईएसजी और ग्रीन एनर्जी के दौर में कई कंपनियां ईवी सुविधा दे रही हैं, लेकिन सैलरी टैक्स में इसकी गणना को लेकर अब भी भ्रम बना हुआ है.
होम लोन के ब्याज पर राहत की मांग
भले ही नया टैक्स सिस्टम कम छूट और कम कटौतियों पर आधारित है, लेकिन आज लगभग हर व्यक्ति का सपना अपना घर लेने का है. ऐसे में अगर खुद के उपयोग वाले मकान के होम लोन ब्याज पर थोड़ी छूट दी जाए, तो यह करदाताओं के लिए बड़ी राहत हो सकती है. इसी तरह ईएसओपी टैक्सेशन को लेकर भी उद्योग जगत लंबे समय से बदलाव की मांग कर रहा है. अभी कर्मचारी को शेयर एक्सरसाइज करते समय टैक्स देना पड़ता है, जबकि उस वक्त हाथ में नकदी नहीं होती. पारिजाद सिरवाला ने कहा, “यह वास्तविक कैश फ्लो की समस्या पैदा करता है.” स्टार्टअप्स के कुछ मामलों में टैक्स टालने की सुविधा है, लेकिन उसका दायरा बहुत सीमित है, जिसे बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है.
स्टैंडर्ड डिडक्शन की बात करें तो इसका मकसद नौकरीपेशा लोगों के रोजमर्रा के कामकाजी खर्चों को बिना किसी बिल-प्रूफ के मान्यता देना है. पारिजाद सिरवाला ने बताया कि यह सुविधा पहली बार 1974 में आई थी, फिर 2005-06 में हटा दी गई और 2018 में दोबारा शुरू की गई. समय के साथ इसकी सीमा बढ़ी है. नए टैक्स सिस्टम में यह 75,000 रुपये तक है, जबकि पुराने सिस्टम में 50,000 रुपये. करदाताओं की उम्मीद है कि इसे कम से कम एक लाख रुपये तक किया जाए, ताकि बढ़ती महंगाई का असर कुछ हद तक संतुलित हो सके, जैसे यूके और जर्मनी में पर्सनल अलाउंस की व्यवस्था है.
नए टैक्स सिस्टम में कटौतियां
नए टैक्स सिस्टम में कटौतियों को शामिल करने के सवाल पर उन्होंने साफ किया कि इस सिस्टम की बुनियाद ही सरलता और कम छूट पर टिकी है. लगभग 70 फीसदी से ज्यादा करदाता पहले ही इसे अपना चुके हैं. ऐसे में बहुत ज्यादा कटौतियां जोड़ना इसके मूल उद्देश्य के खिलाफ होगा. फिर भी, यह उम्मीद जरूर है कि स्वयं के मकान के होम लोन ब्याज जैसी एक-आध अहम राहत वापस लाई जा सकती है, ताकि घर खरीदने वालों पर दबाव कम हो.
रिफंड में तेजी आए
रिफंड में देरी भी इस साल करदाताओं के लिए बड़ी परेशानी रही है. पारिजाद सिरवाला ने बताया कि कानून के अनुसार, रिटर्न प्रोसेस करने के लिए विभाग के पास 9 महीने तक का समय होता है. हालांकि, साधारण मामलों में रिफंड जल्दी दिया जा सकता है. अगर सैलरी या ब्याज जैसी साफ-सुथरी आय वाले मामलों में ऑटो-प्रोसेसिंग हो, बैंक अकाउंट पहले से वैलिडेट हो और अपील जीतने के बाद रिफंड ऑर्डर जल्दी जारी हों, तो रिफंड प्रक्रिया काफी तेज हो सकती है. गैर-निवासियों के लिए विदेशी बैंक खातों में रिफंड भेजने की प्रक्रिया भी आसान करने की जरूरत है.
कैपिटल गेन टैक्स पर क्या?
कैपिटल गेन टैक्स को लेकर अंतिम सवाल पर उन्होंने कहा कि पिछले बजट में इसमें बड़े बदलाव हो चुके हैं, खासकर प्रॉपर्टी से जुड़े नियमों में. इंडेक्सेशन हटाने और बाद में कुछ मामलों में राहत देने जैसे कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं. उनके शब्दों में, “इस बजट में कैपिटल गेन टैक्स में किसी बड़े बदलाव की मुझे व्यक्तिगत तौर पर उम्मीद नहीं है. बहुत कुछ पहले ही किया जा चुका है.” अब सबकी नजरें बजट 2026 पर टिकी हैं, जहां करदाताओं को न सिर्फ टैक्स राहत बल्कि आसान अनुपालन और सरल व्यवस्था की भी उम्मीद है.
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