बजट 2026 में यह साफ कर दिया गया है कि अब TDS काटने वालों, TCS वसूलने वालों और आयकर विभाग, तीनों को CBDT यानी केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा. इसका मतलब यह है कि नियमों की व्याख्या को लेकर अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके अपनाने की गुंजाइश काफी हद तक खत्म हो जाएगी. सरकार का मकसद है कि पूरे देश में एक जैसे नियम लागू हों और भ्रम की स्थिति न बने.
पहले नहीं थी दिशा-निर्देशों को मानने की बाध्यता
असल में, नए कानून के तहत धारा 400(2) में बोर्ड को यह अधिकार तो पहले से दिया गया था कि वह TDS और TCS से जुड़े नियमों को लागू करने में आने वाली दिक्कतों को दूर करने के लिए गाइडलाइंस जारी कर सके. इसके लिए केंद्र सरकार की मंजूरी भी जरूरी होती है और इन गाइडलाइंस को संसद के दोनों सदनों में रखा जाता है. लेकिन एक बड़ी कमी यह थी कि इन दिशा-निर्देशों को मानना आयकर अधिकारियों और टैक्स काटने या वसूलने वालों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं था.
यहीं पर पुराने आयकर कानून, यानी Income-tax Act, 1961 से फर्क पैदा होता था. उस कानून में साफ लिखा हुआ है कि CBDT की ओर से जारी की गई गाइडलाइंस आयकर अधिकारियों और टैक्स काटने या वसूलने वाले व्यक्ति, दोनों पर बाध्यकारी होंगी. नए कानून में यह लाइन न होने की वजह से विवाद की गुंजाइश बनी रहती थी.
1 अप्रैल से लागू होगा संशोधन
इसी कमी को दूर करने के लिए बजट 2026 में प्रस्ताव किया गया है कि धारा 400(2) में संशोधन किया जाए और यह स्पष्ट कर दिया जाए कि TDS/TCS से जुड़े अध्याय को लागू करने में जारी की गई कोई भी गाइडलाइन सभी के लिए बाध्यकारी होगी. यह संशोधन 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा.
इस बदलाव को लेकर टैक्स विशेषज्ञ भी इसे पॉजिटिव स्टेप मान रहे हैं. इकोनॉमिक्स टाइम्स ने N. A. Shah Associate LLP के पार्टनर और डायरेक्ट टैक्स एक्सपर्ट CA गोपाल बोहरा को कोट करते हुए लिखा, “2025 के एक्ट की धारा 400(2) के तहत बोर्ड को TDS/TCS से जुड़े प्रावधानों को लागू करने में आने वाली दिक्कतों को दूर करने के लिए गाइडलाइंस जारी करने का अधिकार तो है, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं था कि ये गाइडलाइंस बाध्यकारी होंगी या नहीं.”
बोहरा के मुताबिक, 1961 के पुराने कानून के उलट 2025 के एक्ट में ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी, जिससे इन दिशा-निर्देशों को अनिवार्य माना जा सके. उन्होंने कहा कि धारा 400(2) में प्रस्तावित संशोधन का मकसद नए कानून को पुराने कानून की मंशा के अनुरूप बनाना है, ताकि CBDT की गाइडलाइंस को आयकर अधिकारी और टैक्स काटने या वसूलने वाले, दोनों मानने के लिए मजबूर हों.
बेवजह की कानूनी लड़ाइयों से बचाने में मददगार
बोहरा का मानना है कि यह बदलाव खास तौर पर उन मामलों में बेहद फायदेमंद होगा, जहां TDS और TCS के नियम जटिल हैं या लगातार बदल रहे हैं. उन्होंने कहा, “ऐसे मामलों में बोर्ड की ओर से जारी गाइडलाइंस काफी स्पष्टता देती हैं और बेवजह की कानूनी लड़ाइयों से बचाने में मदद करती हैं.”
टैक्स रिसर्च फर्म Taxmann की राय भी कुछ ऐसी ही है. उनके अनुसार, अगर इन गाइडलाइंस का बाध्यकारी स्वरूप हटा दिया जाता, तो उनकी कानूनी स्थिति कमजोर हो जाती. तब ये सिर्फ सलाह या स्पष्टीकरण मानी जातीं, जिन्हें मानना जरूरी नहीं होता. इसका नतीजा यह होता कि अलग-अलग जगहों पर नियमों की अलग-अलग व्याख्या होती, अमल में असमानता आती और विवाद बढ़ते.
Taxmann का कहना है कि पुराने आयकर कानून में CBDT की व्याख्या को मानना कानूनी जिम्मेदारी है. इससे TDS जैसे प्रावधानों, खासतौर पर प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन जैसे मामलों, में एकरूपता और भरोसा बना रहता है. अगर यह बाध्यता न होती, तो TDS काटने वाले इन गाइडलाइंस को नजरअंदाज कर सकते थे और उन्हें मानने से कोई कानूनी सुरक्षा भी नहीं मिलती.
ऐसी स्थिति में टैक्स विवाद, नोटिस और कोर्ट केस बढ़ने की पूरी आशंका थी. इसी खतरे को देखते हुए सरकार ने बजट 2026 में यह साफ कर दिया है कि धारा 400(2) में संशोधन कर CBDT की गाइडलाइंस को आयकर अधिकारियों और टैक्स काटने या वसूलने वालों, दोनों के लिए अनिवार्य बनाया जाएगा, ताकि विवाद और मुकदमेबाजी को रोका जा सके.
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