फाइनेंस कमीशन भारत का एक संवैधानिक निकाय है, जो हर पांच साल में बनता है. संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत यह काम करता है. इसका मुख्य काम केंद्र द्वारा इकट्ठा किए गए करों को राज्यों में कैसे बांटा जाए, यह तय करना है. इसे वर्टिकल डेवोल्यूशन कहते हैं. साथ ही यह यह भी सुझाव देता है कि कौन सा राज्य कितना हिस्सा पाएगा, यानी होरिजॉन्टल डेवोल्यूशन. इसमें कई बातों को देखा जाता है, जैसे राज्य की आबादी, उसकी आय कितनी है और राष्ट्रीय औसत से कितना कम है, राज्य की वित्तीय हालत कैसी है और राज्य ने अपने पैसे का कितना अच्छा प्रबंधन किया है.
इन फैक्टर्स के हिसाब से तय होते हैं
पिछले कमीशनों में राज्यों को कुल ट्रांसफर का 80 से 90 फीसदी हिस्सा करों से मिलता था और 10 से 20 फीसदी अनुदान के रूप में. करों का बंटवारा बिना किसी शर्त के होता है, लेकिन अनुदान में कुछ शर्तें लगाई जाती हैं. इतिहास में पहला फाइनेंस कमीशन ने नेट इनकम टैक्स का 55 फीसदी और कुछ एक्साइज ड्यूटी का 40 फीसदी राज्यों को देने की सिफारिश की थी. 1999-2000 तक सिर्फ इनकम टैक्स और एक्साइज का हिस्सा मिलता था. 2000 के बाद संविधान में बदलाव आया और 11वीं फाइनेंस कमीशन से सभी करों का बंटवारा शुरू हुआ, सिवाय सेस और सरचार्ज के. फाइनेंस कमीशन पंचायतों और नगर निकायों को फंड ट्रांसफर की भी सिफारिश करता है.
कमीशन कैसे फैसला लेता है, यह समझना आसान है. इसके सदस्य सभी राज्यों का दौरा करते हैं, वहां की वित्तीय स्थिति देखते हैं, चुनौतियां समझते हैं और फिर फॉर्मूला बनाते हैं. मुख्य पैरामीटर में आबादी सबसे बड़ा होता है. इसके अलावा राज्य की आय, वित्तीय स्थिति और प्रबंधन के प्रयास भी देखे जाते हैं. 16वीं फाइनेंस कमीशन को कोई खास टर्म्स ऑफ रेफरेंस नहीं दिए गए थे, यानी इसे पूरी आजादी थी कि वह अपनी सिफारिशें खुद तय करे.
ये हैं अहम मुद्दे
इस कमीशन के सामने सबसे बड़ा मुद्दा आबादी से जुड़ा है. दक्षिणी राज्य जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश कहते हैं कि जनसंख्या नियंत्रण में उन्होंने अच्छा काम किया है, तो उन्हें दंडित नहीं किया जाना चाहिए. अगर आबादी के आधार पर ज्यादा वजन दिया गया तो उनकी हिस्सेदारी कम हो सकती है. वे चाहते हैं कि फॉर्मूले में डेमोग्राफिक परफॉर्मेंस या जनसंख्या नियंत्रण को ज्यादा महत्व मिले. कई राज्य 50 फीसदी या उससे ज्यादा हिस्सा मांग रहे हैं.
दूसरा मुद्दा राज्यों के साथ न्याय का है. कुछ राज्य, खासकर विपक्षी शासित, कहते हैं कि जीएसटी और सेस से आने वाली कमाई का उचित हिस्सा उन्हें नहीं मिल रहा. इससे उन्हें लगता है कि केंद्र ज्यादा पकड़ बना रहा है. कुछ लोग मानते हैं कि राज्य ज्यादा कर हिस्सा ले रहे हैं, जिससे केंद्र के पास स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे कामों के लिए कम पैसा बचता है. केंद्र इन क्षेत्रों में मदद दे रहा है, लेकिन मूल रूप से ये राज्य के काम हैं.
16वीं फाइनेंस कमीशन केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय रिश्तों को मजबूत बनाने की कोशिश कर रहा है. बजट में इन सिफारिशों से राज्यों को मिलने वाला हिस्सा तय होगा, जो अर्थव्यवस्था पर असर डालेगा. दक्षिणी राज्यों की चिंताएं सही हैं क्योंकि वे जनसंख्या नियंत्रण में आगे हैं, लेकिन सभी राज्यों को संतुलित तरीके से फायदा मिलना चाहिए. यह रिपोर्ट सहकारी संघवाद को मजबूत करेगी और आने वाले सालों में विकास के लिए जरूरी फंड का रास्ता साफ करेगी.
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