डिजिटल हमले, डेटा चोरी, क्रिटिकल इनफ्रास्ट्रक्चर (बिजली, बैंकिंग, चुनाव सिस्टम आदि) पर साइबर अटैक, ये सब मिलकर भारत की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए युद्ध से भी बड़ा खतरा बन गए हैं.
भारत के लिए यह इतना ख़तरनाक क्यों?
TheSundayGuardian की रिपोर्ट में आईपीएस ऑफिसर बृजेश सिंह कहते हैं कि भारत में हर चीज़ तेज़ी से डिजिटल हो रही है. जनधन, UPI, हेल्थ, सरकारी सेवाएं, चुनाव, रक्षा कम्युनिकेशन, हर नई डिजिटल सर्विस के साथ नई कमजोरियां भी पैदा हो रही हैं. सिस्टम जितना बड़ा और कॉम्प्लेक्स होता जा रहा है, उतना ही नाज़ुक भी हो रहा है. एक बड़ा साइबर अटैक पूरे बैंकिंग सिस्टम, बिजली ग्रिड या सरकारी सेवाओं को ठप कर सकता है.
AI की आंधी में कैसे बढ़ रहा है खतरा?
WEF के मुताबिक 87% साइबर सिक्योरिटी लीडर्स कह रहे हैं कि AI से जुड़े खतरे बढ़े हैं और 94% मानते हैं कि इस साल साइबर सिक्योरिटी पर सबसे ज़्यादा असर AI ही डालेगा. AI की मदद से अब ये काम बहुत आसान हो गया है. बहुत ही रियलिस्टिक डीपफेक बनाकर मंत्रियों/अधिकारियों की नकली वीडियो और ऑडियो तैयार की जा रही हैं. क्रिटिकल इनफ्रास्ट्रक्चर जैसे बिजली, बैंकिंग, चुनाव सिस्टम आदि कमजोरियां ऑटोमेटिकली स्कैन हो जाना. लोगों के डेटा के आधार पर बेहद पर्सनलाइज्ड फिशिंग और सोशल इंजीनियरिंग अटैक हो रहे हैं. चुनाव के समय बड़े स्तर पर झूठी खबरें और प्रोपेगैंडा फैलाकर लोकतांत्रिक प्रोसेस को हिला रही हैं.
भारतीय संगठनों की तैयारी और कमज़ोरियां
भारत में कंपनियों ने AI सुरक्षा आकलन लगभग दोगुने कर दिए (37% से बढ़कर 64%) और 77% संगठन साइबर सुरक्षा में खुद AI का इस्तेमाल कर रहे हैं. फिर भी कई बड़ी दिक्कतें हैं जैसे-
जियोपॉलिटिक्स, क्वांटम और थर्ड‑पार्टी रिस्क
64% संगठन अब साइबर रिस्क को जियोपॉलिटिकल तनाव (देशों के बीच टकराव, जासूसी, बैंकों आदि पर हमले) से जोड़कर देखते हैं, और भारत जैसी लोकेशन वाले देश के लिए यह खास तौर पर संवेदनशील बात है. साइबर ऑपरेशन अब “सस्ता और सुरक्षित युद्ध” बन गए हैं, जहां छोटे से प्लेयर भी बहुत बड़ा नुकसान कर सकते हैं, पर खुला युद्ध शुरू नहीं होता. क्वांटम कंप्यूटिंग भविष्य में आज की इनक्रिप्शन तोड़ सकती है. जो भी संवेदनशील कम्यूनिकेशन आज रिकॉर्ड हो रहा है, वह कुछ साल बाद आसानी से देखा जा सकता है.
फिर भी 40% भारतीय संगठनों ने क्वांटम‑resistant उपायों पर सोचा तक नहीं, और सिर्फ लगभग 5% ने बजट में इसे प्राथमिकता दी है, जबकि 33% टेस्टिंग कर रहे हैं. WEF के मुताबिक वो साइबर रिस्क जिसपर भारत में अभी तक ध्यान नहीं दिया गया है, वो है थर्ड-पार्टी घुसपैठ. यानी सप्लायर, क्लाउड पार्टनर वगैरह के जरिए सिस्टम में घुसपैठ. मॉडर्न सॉफ्टवेयर चेन इतनी जटिल है कि एक जगह की गड़बड़ी पूरे नेटवर्क में फैल सकती है, और किसी एक संस्था के लिए पूरी dependency map समझना लगभग नामुमकिन है.

जनता का भरोसा और साइबर फ्रॉड
2025 में 73% लोगों ने या तो खुद या किसी जानने वाले के साथ साइबर फ्रॉड का अनुभव रिपोर्ट किया. इससे डिजिटल सिस्टम पर भरोसा टूट रहा है. जब लोगों को ऑनलाइन सिस्टम पर विश्वास नहीं रहता, तो खासकर कमजोर वर्ग पीछे हटने लगते हैं. अब साइबर सुरक्षा को सिर्फ IT या टेक्निकल ईशू नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और पब्लिक ट्रस्ट के मुख्य मुद्दे के रूप में देखना होगा.
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