ट्रंप के साथ सबसे बड़ा अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल
इस बार डावोस में अमेरिका की मौजूदगी अब तक की सबसे बड़ी बताई जा रही है. ट्रंप के साथ विदेश मंत्री मार्को रुबियो, वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट, वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ जैसे बड़े चेहरे पहुंचेंगे. पिछले साल ट्रंप ने दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद वीडियो के जरिए डावोस को संबोधित किया था और व्यापक टैरिफ, नाटो देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव और फेडरल रिजर्व से तुरंत ब्याज दरें घटाने की मांग कर माहौल गरमा दिया था. उसी भाषण ने आने वाले 12 महीनों की उथल-पुथल का संकेत दे दिया था.
कमजोर होती वैश्विक व्यवस्था की तस्वीर
एक साल बाद हालात और ज्यादा बिगड़ते दिख रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन की बढ़ती ताकत और मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था को कमजोर कर दिया है. ऐसे में संवाद की भावना खोखली लगने लगी है. यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की भी डावोस पहुंच रहे हैं, ताकि जंग के बीच अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाया जा सके. लेकिन मंच पर मौजूद कई नेता इस बात से चिंतित हैं कि क्या बातचीत से समाधान निकलेगा या दुनिया और बंटेगी.
टैरिफ धमकियों से यूरोप में बेचैनी
डावोस से ठीक पहले ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों को झटका दिया. उन्होंने ब्रिटेन समेत कई देशों पर दंडात्मक टैरिफ लगाने का ऐलान कियाय क्योंकि वे ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की उनकी योजना का समर्थन नहीं करते. इस बयान से यूरोप में हड़कंप मच गया और यूरोपीय संघ के राजदूतों को आपात बैठक करनी पड़ी. यह घटनाक्रम दिखाता है कि ट्रंप की नीतियां सहयोग से ज्यादा दबाव की रणनीति पर टिकी हैं.
वैश्विक जोखिमों की बढ़ती चिंता
WEF के एक सर्वे में 1,300 से ज्यादा राजनेताओं, उद्योगपतियों और शिक्षाविदों ने आने वाले दो सालों के सबसे बड़े खतरे के रूप में ‘भू-आर्थिक टकराव’ को बताया. यानी बड़ी शक्तियों के बीच आर्थिक प्रभुत्व की लड़ाई. दूसरे नंबर पर देशों के बीच सीधी जंग की आशंका सामने आई. हाल के हफ्तों में ट्रंप के आक्रामक रुख ने इन आशंकाओं को और गहरा किया है. उनके वेनेजुएला, यूक्रेन और ईरान से जुड़े बयान सबसे सामने हैं.
सैन्य खर्च और शक्ति संतुलन में बदलाव
दुनिया का सैन्य खर्च अब 2.7 खरब डॉलर तक पहुंच चुका है, जो शीत युद्ध के बाद सबसे तेज बढ़ोतरी है. कई देश रूस, चीन और अमेरिका से संभावित खतरों को देखते हुए रक्षा बजट बढ़ा रहे हैं. हालांकि अमेरिकी ताकत अब भी बड़ी है, लेकिन चीन और विकासशील देशों की बढ़ती आर्थिक हिस्सेदारी से लंबी अवधि में शक्ति संतुलन बदलता दिख रहा है. कुछ राजनयिक मानते हैं कि अमेरिकी दबाव के खिलाफ वैश्विक स्तर पर धीरे-धीरे प्रतिरोध भी बढ़ सकता है.
सहयोग की कोशिशें और डावोस का असली चेहरा
टकराव के बीच सहयोग की कोशिशें भी जारी हैं, हालांकि वे सुर्खियों में कम आती हैं. संयुक्त राष्ट्र इस साल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर एक स्वतंत्र वैज्ञानिक पैनल शुरू करेगा. वहीं, डावोस में 60 से ज्यादा राष्ट्राध्यक्ष, 55 वित्त मंत्री और 800 से अधिक बड़ी कंपनियों के प्रमुख जुटेंगे. हालांकि इस आयोजन की आलोचना भी होती है. जिसमें निजी जेट उड़ानों में बढ़ोतरी और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर सवाल उठते हैं.
नए दौर में प्रवेश करता डावोस
इस साल का डावोस एक नए युग की शुरुआत भी है, क्योंकि मंच के संस्थापक क्लॉस श्वाब अब सक्रिय भूमिका में नहीं हैं. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि WEF अब अपने सुनहरे दौर से आगे निकल चुका है, जबकि कुछ इसे अब भी प्रभाव डालने का मंच मानते हैं. सवाल यही है कि क्या डावोस फिर से वैश्विक समस्याओं के समाधान की जगह बन पाएगा, या यह सिर्फ ताकतवर लोगों की रस्मी मुलाकात बनकर रह जाएगा.
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