De-Dollarisation – विशेषज्ञों का कहना है कि डी-डॉलराइजेशन की यह प्रक्रिया अब केवल एक आर्थिक प्रयोग नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक जरूरत बन गई है. जब तक भू-राजनीतिक तनाव और टैरिफ की अनिश्चितता बनी रहेगी सोने की चमक डॉलर के फीके पड़ते रंग को और उजागर करती रहेगी. ट्रंप की बेतुके बयान और अमेरिका की मनमानी नीतियां डॉलर के लिए घातक सिद्ध होती दिख रही हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीतियां, प्रतिबंधों का डर और व्यापार युद्ध ने अन्य देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अपनी पूरी संपत्ति एक ही मुद्रा (डॉलर) में रखना अब सुरक्षित नहीं है. यह वैश्विक वित्तीय बाजारों पर अमेरिका के एकाधिकार को कमजोर कर रही है. साल 2025 में अमेरिकी डॉलर में 9% की गिरावट दर्ज की गई थी जो पिछले एक दशक की सबसे बड़ी गिरावट है.
भारतीय रिजर्व बैंक भी खरीद रहा सोना
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी इस वैश्विक लहर को भांप लिया है. 16 जनवरी 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में पिछले 10 महीनों में 4 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई. दिलचस्प बात यह है कि इस वृद्धि का एक-तिहाई हिस्सा केवल RBI के 880 टन सोने के भंडार की बढ़ी हुई कीमत की वजह से है. पिछले एक साल में जहां RBI की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों का मूल्य केवल 5% बढ़ा, वहीं सोने की होल्डिंग्स का मूल्य 70% तक उछल गया. इसका मतलब है कि भारत का खजाना अब डॉलर की तुलना में सोने की वजह से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. हालांकि, RBI ने बहुत आक्रामक तरीके से सोना नहीं खरीदा, लेकिन उसकी पुरानी होल्डिंग्स ने ही उसे मालामाल कर दिया है.
सोना खरीदने की मची है होड़
सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देश अपनी अर्थव्यवस्था को ‘ट्रंप-प्रूफ’ बनाने के लिए सोने की खरीदारी बढ़ा चुके हैं. साल 2025 में सोना खरीदने वाले प्रमुख केंद्रीय बैंकों की सूची कुछ इस प्रकार है-
- पोलैंड: 95 टन
- कज़ाख़स्तान: 49 टन
- ब्राज़ील: 43 टन
- तुर्की: 27 टन
- चीन: 26 टन
इन देशों का सोने की ओर मुड़ना यह दर्शाता है कि भविष्य में वे अपनी मुद्रा को स्थिरता देने के लिए पीली धातु पर ज्यादा निर्भर रहेंगे.
क्या यह डॉलर के अंत की शुरुआत है?
नोमुरा (Nomura) के विश्लेषकों ने अपनी रिपोर्ट में संकेत दिया है कि अमेरिकी ऋण बाजारों में डी-डॉलराइजेशन को लेकर चर्चा अब गंभीर मोड़ ले चुकी है. राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले ही धमकी दी है कि यदि यूरोपीय देश अमेरिकी सरकारी बॉन्ड (Treasury Bonds) बेचना जारी रखते हैं, तो वह ‘कड़ी जवाबी कार्रवाई’ करेंगे. यह चिंता इसलिए बड़ी है क्योंकि नवंबर 2025 तक अकेले यूरोपीय संघ के पास 10.4 ट्रिलियन डॉलर की अमेरिकी एसेट्स थीं. यह कुल विदेशी स्वामित्व वाली अमेरिकी संपत्तियों का लगभग 29% हिस्सा है. यदि यूरोप और अन्य मित्र देश अपनी डॉलर होल्डिंग्स को सोने या अन्य मुद्राओं में बदलना शुरू करते हैं, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए संकट खड़ा हो सकता है.
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