जानकारों का मानना है कि ट्रंप का यह यू-टर्न कोई हृदय परिवर्तन नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक मजबूरी है. अमेरिका को अब यह डर सताने लगा है कि उसकी ‘विस्तारवादी’ छवि के कारण रूस और चीन वैश्विक नेतृत्व की दौड़ में उसे पीछे छोड़ सकते हैं. साथ ही, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नाटो (NATO) के भीतर संभावित टूट के खतरे ने ट्रंप को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया है.
1. अमेरिका की वैश्विक लीडरशिप पर मंडराता खतरा
दावोस में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी जैसे नेताओं ने अमेरिका के बढ़ते वर्चस्व की खुलकर आलोचना की. मार्क कार्नी ने चेतावनी दी कि अमेरिका की एकतरफा नीतियों के कारण दुनिया अब नए गठबंधन तलाश रही है. अमेरिका को आशंका है कि अगर उसने अपनी छवि नहीं सुधारी, तो चीन और रूस नए वैश्विक समीकरण गढ़कर उसकी जगह ले लेंगे.
2. दुनिया भर में पनपता ‘एंटी-ट्रंप’ माहौल
ट्रंप की आक्रामक नीति से नाटो और यूरोपीय यूनियन के कई देश नाराज हैं. इसी का नतीजा था कि ट्रंप के भाषण के बाद यूरोपीय संसद ने अमेरिका के साथ होने वाली ट्रेड डील पर काम रोक दिया. फ्रांस ने भी साफ कर दिया कि किसी देश की संप्रभुता पर दबाव बनाने के लिए टैरिफ का इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं है. ग्रीनलैंड विवाद ने दुनिया भर में अमेरिका के प्रति नकारात्मक भावना को बढ़ा दिया है.
3. नाटो और संयुक्त राष्ट्र के नियमों का उल्लंघन
ग्रीनलैंड, डेनमार्क का हिस्सा है और डेनमार्क नाटो का सदस्य है. नाटो के आर्टिकल-5 के मुताबिक, किसी एक सदस्य पर हमला पूरे नाटो पर हमला माना जाता है. इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र चार्टर भी बिना युद्ध की स्थिति के किसी संप्रभु देश पर कब्जे की इजाजत नहीं देता. अमेरिका के लिए इन नियमों को तोड़ना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को अलग-थलग करना होता.
4. 1951 का रक्षा समझौता और कानूनी बाधा
अमेरिका और डेनमार्क के बीच 1951 में एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ था. इस समझौते में अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संप्रभुता को मान्यता दी थी. अगर ट्रंप सैन्य कार्रवाई करते, तो यह उनके अपने ही देश द्वारा किए गए पुराने वादों और कानूनी दस्तावेजों का खुला उल्लंघन होता, जिसे अंतरराष्ट्रीय अदालतों में चुनौती दी जा सकती थी.
5. नाटो के अंदर टूट का गंभीर खतरा
नाटो के 32 देशों में से अधिकांश यूरोपीय यूनियन का हिस्सा हैं. अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को लेकर अड़ियल रुख अपनाता, तो संगठन की एकता पूरी तरह बिखर सकती थी. नाटो में फूट पड़ना अमेरिका के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के खिलाफ होता, क्योंकि इससे पश्चिमी देशों का गठबंधन कमजोर हो जाता और रूस-चीन की स्थिति मजबूत हो जाती.
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