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सोना इन दिनों ऐसी दौड़ लगा रहा है कि आम खरीदार बस दूर से देख रहा है. कभी 70-75 हजार में मिलने वाला 10 ग्राम 24 कैरेट सोना इस साल 176121 रुपये तक पहुंच गया. हालांकि, इसने इसके बाद गोता लगाया और सर्राफा बाजार में 148746 लाख रुपये तक आ गया. लेकिन, अब फिर इसमें तेजी है. लेकिन, हालिया तेजी के बाद भी कुछ बाजार पंडित इसके 80,000 रुपये तोला होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं. और इसकी वजहें भी वे दिलचस्प बता रहे हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि हाल के महीनों में सोने के ‘रॉकेट’ बनने के पीछे सबसे बड़ा हाथ वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा की गई अंधाधुंध खरीदारी है. आंकड़ों की मानें तो ब्रिक्स (BRICS) देशों- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने पिछले छह महीनों में दुनिया भर में हुई कुल सोने की खरीद का लगभग 50% हिस्सा अकेले ही खरीदा है. इन देशों की रणनीति अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता को कम करने की थी, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की मांग और कीमत दोनों में ही बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की गई.

विशेषज्ञों का कहना है कि अब वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, जिसका सीधा असर सोने की कीमतों पर पड़ना तय है. पिछले काफी समय से अमेरिका और रूस के बीच जारी तनाव के कारण रूस ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल लगभग बंद कर दिया था और अपना पूरा ध्यान सोने के भंडार बढ़ाने पर लगाया था. लेकिन हालिया रिपोर्ट्स अब यह इशारा कर रही हैं कि रूस अपनी रणनीति बदलकर फिर से डॉलर का उपयोग बढ़ा सकता है, जो सोने की कीमतों के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होगा.

यदि रूस अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अपनी पैठ बनाने के लिए फिर से डॉलर को प्राथमिकता देता है, तो वह अपने विशाल सोने के भंडार को बाजार में बेच सकता है. अगर रूस अपने भंडार से सोने की बिकवाली शुरू करता है, तो वैश्विक बाजार में सोने की आपूर्ति अचानक और भारी मात्रा में बढ़ जाएगी, जिससे कीमतों में बड़ी गिरावट आना लाजिमी है.
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सोने की कीमतों में संभावित गिरावट का एक और बड़ा कारण रूस-यूक्रेन युद्ध की स्थिति से जुड़ा हुआ है. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह युद्ध किसी व्यापार समझौते या कूटनीतिक बातचीत के जरिए समाप्त होता है, तो वैश्विक बाजार से अनिश्चितता के बादल छंट जाएंगे. ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि जब भी दुनिया में शांति और स्थिरता आती है तो सोने की कीमत घटती है.

हाल के महीनों में चीन, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने भी सोने की खरीद बढ़ाई थी. लेकिन संकेत हैं कि अब ये देश अपनी खरीद कम कर सकते हैं. अगर इन बड़े खरीदारों की तरफ से मांग में कमी आती है, तो बाजार में सोने की कीमतों पर भारी दबाव बनेगा और यह वह स्थिति होगी जब सोना अपने ऊंचे स्तरों से तेजी से नीचे की ओर फिसलना शुरू कर देगा.

Bloomberg ने एक चौंकाने वाला अनुमान जताया है कि भारत में सोने की कीमतें आने वाले समय में 70,000 से 80,000 रुपये प्रति 10 ग्राम तक आ सकती हैं. विश्लेषकों का तर्क है कि यह गिरावट अचानक रातों-रात नहीं आएगी, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों के बदलने के साथ यह धीरे-धीरे नीचे की तरफ बढ़ेगी. जानकारों का मानना है कि 2027 के अंत तक बाजार में स्थिरता आने पर सोने की कीमतें 80,000 रुपये के स्तर के आसपास जाकर टिक सकती हैं.

हालांकि, बाजार के पंडित यह भी चेतावनी देते हैं कि सोना एक ऐसी धातु है जो वैश्विक संकटों से सबसे पहले प्रभावित होती है. इसलिए, जब तक कीमतें वास्तव में नीचे नहीं आतीं, तब तक आम खरीदारों को अपनी खरीदारी की योजना बहुत ही सावधानी और बाजार के रुख को समझकर ही बनानी चाहिए ताकि वे ऊंचे भाव पर फंस न जाएं.

हालांकि, बाजार के पंडित यह भी चेतावनी देते हैं कि सोना एक ऐसी धातु है जो वैश्विक संकटों से सबसे पहले प्रभावित होती है. इसलिए, जब तक कीमतें वास्तव में नीचे नहीं आतीं, तब तक आम खरीदारों को अपनी खरीदारी की योजना बहुत ही सावधानी और बाजार के रुख को समझकर ही बनानी चाहिए ताकि वे ऊंचे भाव पर फंस न जाएं.

फिलहाल पूरी दुनिया के निवेशकों और आम खरीदारों की नजरें रूस, अमेरिका और ब्रिक्स देशों की अगली चालों पर टिकी हैं. अगर डॉलर फिर से मजबूत होता है और युद्ध खत्म होता है, तो सोने का गिरना निश्चित है, लेकिन अगर तनाव और बढ़ता है, तो सोने की यह चमक आने वाले समय में और भी ज्यादा तेज हो सकती है.
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