कभी भारतीय में पैसा लगाने के मामले में दूर खड़ी रहने वाली यह वॉल स्ट्रीट दिग्गज कंपनी अब तेजी से आगे बढ़ रही है. पिछले साल भारतीय इक्विटी ऑफरिंग में गोल्डमैन चौथे स्थान पर पहुंच गई, जबकि इससे पहले वह कभी टॉप पांच में नहीं रही थी. विलय और अधिग्रहण की रैंकिंग में भी वह पांचवें नंबर पर रही. इतना ही नहीं, शेयर बिक्री के मामले में उसने एक दशक बाद मॉर्गन स्टेनली को पीछे छोड़ दिया.
राह हालांकि आसान नहीं है. जेपीमॉर्गन और सिटीग्रुप जैसी विदेशी बैंकिंग कंपनियां भारत में पहले से मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं. वहीं कोटक महिंद्रा बैंक और एक्सिस बैंक जैसे घरेलू बैंक अपने ग्राहकों से गहरे रिश्ते और मजबूत बाजार पकड़ रखते हैं. ऐसे माहौल में बाजार हिस्सेदारी बढ़ाना किसी चुनौती से कम नहीं है. फिर भी गोल्डमैन को भरोसा है कि भारत में आगे और अवसर हैं. इस समय उसके पास कम से कम 10 आईपीओ के ऑर्डर हैं. करीब 138 कंपनियां पहले ही नियामकीय मंजूरी पा चुकी हैं और लगभग 68 कंपनियां कतार में हैं. पिछले साल भारतीय कंपनियों ने रिकॉर्ड 22 अरब डॉलर जुटाए, जिससे भारत दुनिया के सबसे सक्रिय आईपीओ बाजारों में शामिल हो गया.
दफ्तर ही नहीं, नजरिया भी बदल
गोल्डमैन का बदला नजरिया उसके दफ्तरों में भी दिखता है. पहले मुंबई के पुराने टेक्सटाइल इलाके की एक साधारण तीन मंजिला इमारत में उसकी टीम बैठती थी. आज वह इमारत टूट रही है. अब कंपनी का नया दफ्तर मुंबई के वर्ली बिजनेस डिस्ट्रिक्ट की कांच और स्टील से बनी ऊंची इमारत में है, जहां करीब 130 बैंकर्स, ट्रेडर्स और प्राइवेट क्रेडिट विशेषज्ञ काम कर रहे हैं. इसके अलावा बेंगलुरु में उसका टेक्नोलॉजी केंद्र दो दशक से सक्रिय है और हजारों लोगों को रोजगार देता है.
सोंजॉय चटर्जी, जो इस महीने 58 वर्ष के हो रहे हैं, लगभग 15 साल पहले ICICI बैंक से गोल्डमैन में आए थे. उस समय कंपनी भारत में लाभ कमाने के लिए संघर्ष कर रही थी. ग्राहकों की फीस को लेकर संवेदनशीलता और बेहद कम मार्जिन पर काम करने को तैयार प्रतिस्पर्धियों के कारण कंपनी कई बड़े सरकारी सौदों से दूर रही. हुंडई मोटर इंडिया और टाटा कैपिटल के आईपीओ जैसे बड़े अवसर उसके हाथ से निकल गए.
कंपनी ने बदला काम करने का तरीका
अब कंपनी की रणनीति पहले जैसी नहीं रही. अब वह सिर्फ एक काम पर ध्यान नहीं दे रही, बल्कि इक्विटी अंडरराइटिंग, विलय-अधिग्रहण (M&A), प्राइवेट क्रेडिट और स्ट्रक्चर्ड फाइनेंस जैसे कई क्षेत्रों में एक साथ अपनी पकड़ मजबूत कर रही है. सोंजॉय चटर्जी का कहना है कि भारत जैसे देश में निवेश बैंकिंग को केवल फीस कमाने के नजरिये से नहीं देखा जा सकता. उनके मुताबिक, यहां निवेश बैंकिंग असल में बड़े और लंबे समय के कारोबार की शुरुआत का रास्ता होती है. वे बताते हैं कि आईपीओ, फॉलो-ऑन ऑफर और ब्लॉक ट्रेड जैसे सौदे ही वे मौके होते हैं, जहां से किसी कंपनी के साथ लंबा और मजबूत रिश्ता बनता है और यह दिखाने का अवसर मिलता है कि हम बड़े स्तर पर विकास में साथ दे सकते हैं.
पिछले साल कंपनी ने 23 बड़े सौदों के जरिए 4 अरब डॉलर से ज्यादा के शेयर बेचे. आईटीसी में ब्रिटिश अमेरिकन टोबैको द्वारा 1.5 अरब डॉलर की हिस्सेदारी बेचने जैसे बड़े लेनदेन में उसकी अहम भूमिका रही. टाटा मोटर्स द्वारा इवेको ग्रुप के अधिग्रहण में भी कंपनी शामिल थी. प्राइवेट क्रेडिट के क्षेत्र में भी उसने अपनी मजबूत पहचान बनाई है. साल 2006 से अब तक उसके वैकल्पिक निवेश कारोबार ने भारत में 8.5 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है. हाल ही में जुबिलेंट भारती समूह को 60 करोड़ डॉलर की फंडिंग दी गई, ताकि वह हिंदुस्तान कोका-कोला बेवरेजेज में हिस्सेदारी खरीद सके.
भारत का पूंजी बाजार भी पहले से बेहतर
भारत में पूंजी बाजार का माहौल भी पहले से बेहतर हुआ है. पिछले कुछ वर्षों में सरकार और नियामकों ने कई सुधार किए हैं. विदेशी निवेश की सीमा में ढील दी गई है, आईपीओ प्रक्रिया को आसान और तेज बनाया गया है और कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार को भी ज्यादा खुला किया गया है. इसका असर यह हुआ है कि घरेलू म्यूचुअल फंड हर महीने अरबों डॉलर जुटा रहे हैं, जिससे बाजार में स्थिरता बनी हुई है.
कंपनी ने नेतृत्व स्तर पर भी बदलाव किए हैं. सोंजॉय चटर्जी की भूमिका को और मजबूत किया गया है. देवराजन नाम्बाकम और सुदर्शन रामकृष्णन को निवेश बैंकिंग का सह-प्रमुख बनाया गया है. बैंक ऑफ अमेरिका से सुनील खेतान को इक्विटी और फाइनेंसिंग की जिम्मेदारी दी गई है. पिछले साल मुंबई में छह नए मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त किए गए, जो अब तक की सबसे बड़ी नियुक्ति रही है.
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