ये कंपनियां मान रही हैं कि एआई से आने वाले सालों में बहुत ज्यादा कमाई होगी. जैसे चैटजीपीटी जैसे टूल्स के मुकाबले अपने बेहतर मॉडल बनाने के लिए हजारों महंगी चिप्स की जरूरत पड़ती है. इसलिए ये पुराने ऑफिस जैसी चीजों से पैसा हटाकर डेटा सेंटर्स और कैपिटल प्रोजेक्ट्स पर लगा रही हैं. हर कंपनी का ये खर्च पिछले 10 सालों में किसी भी कंपनी का सबसे ज्यादा कैपिटल स्पेंडिंग रिकॉर्ड तोड़ेगा.
अमेजन से लेकर मेटा तक करेगा निवेश
कंपनियों का ब्रेकडाउन देखें तो अमेजन सबसे आगे है, वो 2026 में 200 बिलियन डॉलर तक खर्च करने वाली है. अल्फाबेट यानी गूगल 185 बिलियन तक जा सकती है. मेटा 135 बिलियन तक और माइक्रोसॉफ्ट करीब 105 बिलियन डॉलर का प्लान कर रही है. ये सब मिलाकर करीब 650 बिलियन डॉलर बनता है, जो पिछले साल से 60 फीसदी ज्यादा है. मेटा ने तो पहली बार छह साल में रिसर्च से ज्यादा पैसा प्रॉपर्टी और इक्विपमेंट पर लगाया है.
एक्सपर्ट ने बताया कंपनियां क्यों रही हैं ज्यादा निवेश?
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि ये कंपनियां एआई कंप्यूटिंग को अगला बड़ा बाजार मान रही हैं, जहां जो आगे रहेगा वो सबसे ज्यादा फायदा उठाएगा. डीए डेविडसन के एनालिस्ट गिल लूरिया ने कहा कि ये चारों कंपनियां नहीं चाहतीं कि कोई हार जाए. इसलिए ये रेस में पूरी ताकत लगा रही हैं. लेकिन कुछ लोग चिंता भी जता रहे हैं कि इतना बड़ा खर्च कब तक चलेगा और रिटर्न कब आएगा. थ्योरी वेंचर्स के निवेशक तोमास जंगुज कहते हैं कि ये कंपनियां पहले कैश बनाने वाली मशीन थीं, अब उधार लेकर खर्च कर रही हैं. ये अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा कैटलिस्ट हैं, लेकिन बोतलनेक भी आ सकते हैं.
अमेजन के शेयर्स फिसले
बूमी के सीईओ स्टीव लुकास कहते हैं कि एआई की क्षमता पर कोई बहस नहीं, लेकिन समय और अर्थशास्त्र पर सवाल हैं. निवेशक चिंतित हैं कि क्या ये खर्च तुरंत फायदा देगा या नहीं. कुछ शेयरों में गिरावट भी आई है, जैसे अमेजन के शेयर गिरे क्योंकि निवेशकों को डर है कि रिटर्न में देरी हो सकती है.
भारत के नजरिए से देखें तो ये आंकड़ा बहुत बड़ा है. भारत सरकार का पूरा बजट 2026-27 में करीब 670 बिलियन डॉलर के आसपास है, और सिर्फ चार कंपनियां एआई पर इतना खर्च करने वाली हैं. ये दिखाता है कि एआई कितनी तेजी से दुनिया बदल रहा है. ये खर्च न सिर्फ टेक सेक्टर को बल्कि अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करेगा, जैसे जॉब्स, इंडस्ट्री और एनर्जी पर असर पड़ेगा. कंपनियां मान रही हैं कि जो पहले मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर बनाएगा वो बाजार पर कब्जा कर लेगा. लेकिन चुनौतियां भी हैं, जैसे सप्लाई चेन की समस्या और महंगे खर्च का बोझ. आने वाले समय में देखना होगा कि ये निवेश कितना फल देता है.
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