एफ एंड ओ में जहां रोजाना उतार चढ़ाव और लीवरेज निवेशक को मिनटों में नुकसान में डाल सकता है, वहीं बॉन्ड्स में निवेश का फ्रेमवर्क साफ होता है. निवेशक को पहले से पता होता है कि उसे कितने समय तक पैसा लगाना है और कितना ब्याज मिलेगा. यही वजह है कि नौ में से दस एफ एंड ओ ट्रेडर के नुकसान के मुकाबले बॉन्ड निवेश कहीं ज्यादा अनुशासित माना जाता है.
भारत में BBB रेटिंग बॉन्ड्स क्यों हैं सीमित
नीति आयोग की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 98 प्रतिशत कॉरपोरेट बॉन्ड्स की रेटिंग AA या उससे बेहतर है. इसका मतलब यह है कि BBB रेटिंग वाले बॉन्ड्स का दायरा काफी छोटा है. यही सीमित सप्लाई इन बॉन्ड्स को खास बनाती है और इन पर मिलने वाला रिटर्न भी ज्यादा होता है. 5 फरवरी तक के डेटा के अनुसार सेबी से रजिस्टर्ड ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म जिराफ पर BBB रेटिंग वाले करीब 38 बॉन्ड निवेश के लिए उपलब्ध हैं. ये बॉन्ड्स क्रिसिल की रेटिंग गाइडलाइंस के तहत इन्वेस्टमेंट ग्रेड में आते हैं.
BBB बॉन्ड्स में डिफॉल्ट और डाउनग्रेड का असली डेटा
क्रिसिल ने वित्त वर्ष 2015 से 2025 के बीच के आंकड़ों का अध्ययन किया है. इसके अनुसार पहले साल में इन बॉन्ड्स के डिफॉल्ट की दर आधे प्रतिशत से भी कम रही. दूसरे साल में यह 1.27 प्रतिशत और तीसरे साल में 2.21 प्रतिशत तक पहुंची. इसी अवधि में दो में से एक से भी कम BBB बॉन्ड्स को डाउनग्रेड किया गया.
क्रेडिट रेटिंग निवेश के लिए क्यों है सबसे अहम फैक्टर
क्रेडिट रेटिंग सिर्फ सुरक्षा का संकेत नहीं होती, बल्कि बॉन्ड की कीमत और लिक्विडिटी को भी प्रभावित करती है. रेटिंग गिरते ही बॉन्ड का बाजार भाव दबाव में आ सकता है. इसलिए निवेश से पहले रेटिंग एजेंसी और कंपनी की फाइनेंशियल सेहत को समझना बेहद जरूरी है.
बॉन्ड निवेश पर टैक्स कैसे लगता है
अगर निवेशक बॉन्ड को मैच्योरिटी तक होल्ड करता है, तो उस पर मिलने वाला ब्याज इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज में आता है. यह आपकी कुल आय में जुड़कर टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्सेबल होता है.
मैच्योरिटी तक रखने पर रिटर्न और टैक्स का गणित
मान लीजिए किसी BBB बॉन्ड पर 14 प्रतिशत ब्याज मिल रहा है और निवेशक 30 प्रतिशत टैक्स स्लैब में है. ऐसे में टैक्स और सेस काटने के बाद नेट रिटर्न घटकर करीब 10 प्रतिशत के आसपास रह जाता है. अगर सालाना ब्याज 5,000 रुपये से ज्यादा है तो 10 प्रतिशत टीडीएस भी कटता है, जिसे आईटीआर में एडजस्ट करना होता है.
सेकेंडरी मार्केट में बेचने पर कैपिटल गेन टैक्स
अगर बॉन्ड को एक साल से पहले बेचकर मुनाफा कमाया जाता है, तो वह शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन माना जाएगा और 31.2 प्रतिशत तक टैक्स लगेगा. वहीं एक साल बाद बेचने पर 12.5 प्रतिशत लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लागू होगा.
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