शुरुआती वर्षों से लगातार बढ़ता खर्च
लोकसभा में दिए गए जवाबों के मुताबिक, 1951 में गणतंत्र दिवस परेड पर केंद्र सरकार का खर्च महज 18,362 रुपये था. लेकिन जैसे-जैसे परेड का दायरा बढ़ा और इसमें ज्यादा सैन्य टुकड़ियां, झांकियां और सरकारी विभाग शामिल होने लगे, खर्च तेजी से बढ़ता गया. 1956 तक यह रकम 5.75 लाख रुपये पहुंच गई. 1971 में खर्च 17.12 लाख रुपये था, जो 1973 में बढ़कर 23.38 लाख और 1988 तक करीब 70 लाख रुपये हो गया. इसके मुकाबले 1986 में टिकट बिक्री से सरकार को सिर्फ 7.47 लाख रुपये की कमाई हुई थी.
1990 के बाद खर्च पर चुप्पी
1990 के दशक के बाद से केंद्र सरकार परेड के कुल खर्च को लेकर स्पष्ट आंकड़े देने से बचती रही है. अधिकतर लोकसभा जवाबों में सरकार ने कहा कि गणतंत्र दिवस परेड की तैयारियां कई मंत्रालयों, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, सार्वजनिक उपक्रमों और अन्य एजेंसियों द्वारा की जाती हैं. हर एजेंसी अपने बजट से खर्च करती है, इसलिए कुल खर्च को एक ही मद में जोड़ना संभव नहीं है. हालांकि आरटीआई से सामने आया कि 2008 में टिकट से करीब 17.63 लाख रुपये की आमदनी हुई, जबकि परेड की तैयारी पर अनुमानित खर्च 145 करोड़ रुपये था.
खर्च बनाम टिकट से कमाई का अंतर
समय के साथ यह अंतर और बढ़ता गया. 2015 में गणतंत्र दिवस परेड की तैयारी पर खर्च करीब 320 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. वहीं टिकट बिक्री से होने वाली कमाई बेहद सीमित रही. 2018 से 2020 के बीच सरकार को टिकट से औसतन 34 लाख रुपये सालाना मिले. कोरोना काल में दर्शकों की संख्या सीमित होने से 2021 में यह कमाई घटकर 10.12 लाख और 2022 में सिर्फ 1.14 लाख रुपये रह गई.
रक्षा मंत्रालय का औपचारिक बजट
रक्षा मंत्रालय के तहत सेरेमोनियल्स डिवीजन को सभी औपचारिक आयोजनों के लिए अलग बजट दिया जाता है. 2018-19 में यह बजट 1.53 करोड़ रुपये था, जो 2019-20 में 1.39 करोड़ और 2020-21 से 2022-23 तक करीब 1.32 करोड़ रुपये रहा. इसमें गणतंत्र दिवस परेड और बीटिंग रिट्रीट समारोह दोनों शामिल होते हैं. हालांकि यह पूरी लागत नहीं दर्शाता, क्योंकि असली खर्च अलग-अलग एजेंसियां अपने स्तर पर करती हैं.
2023 में लौटी भीड़, कमाई फिर बढ़ी
कोरोना के बाद 2023 में जब दर्शक बड़ी संख्या में परेड देखने पहुंचे, तो टिकट बिक्री से सरकार को 28.36 लाख रुपये की आमदनी हुई. हालांकि कुछ टिकट सिस्टम एरर के चलते रद्द भी हुए, जिनका रिफंड जारी है. कुल मिलाकर साफ है कि गणतंत्र दिवस परेड राष्ट्रीय गौरव का आयोजन है, जहां खर्च को कमाई से नहीं, बल्कि परंपरा और प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है.
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