Fuel Crisis Effect : ग्लोबल रेटिंग एजेंसी एसएंडीप ने कहा है कि ईरान संकट से भारत की तेल कंपनियों के मुनाफे पर भी असर होगा. हालांकि, सरकार पहले की तरह बजटीय आवंटन या उत्पाद शुल्क में कटौती के जरिये इन कंपनियों पर पड़ने वाले दबाव को कम कर सकती है, जैसा उसने रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान किया था लेकिन ऐसे कदम उठाए जाने की संभावना अभी स्पष्ट नहीं है.
ईरान संकट से भारत की तेल कंपनियों का मुनाफा कम होगा.
अमेरिका-ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. सप्ताह की शुरुआत में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई थी, क्योंकि वैश्विक तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा संभालने वाला होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावी रूप से बंद था. बाद में बुधवार को कीमतें घटकर करीब 88 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं. एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने साल 2026 के लिए ब्रेंट कच्चे तेल की औसत कीमत का अनुमान पांच डॉलर बढ़ाकर 65 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है.
क्यों लगाया नुकसान का अनुमान
एजेंसी के अनुसार, भारत को अपनी कच्चे तेल की जरूरतें पूरी करने के लिए समुद्री मार्गों पर निर्भर रहना पड़ेगा, हालांकि आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने की कुछ गुंजाइश है. भारत पहले भी एशिया के बाहर रूस और दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्रों से तेल खरीदता रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, रूस से भारत का आयात फिलहाल करीब 11 लाख बैरल प्रतिदिन है जबकि वेनेजुएला से आयात पिछले महीने फिर शुरू हुआ और यह लगभग 1,42,000 बैरल प्रतिदिन पर पहुंच गया है.
बड़े आयात पर अब भी संकट
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88 फीसदी आयात करता है और दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है. देश की कुल खपत लगभग 58 लाख बैरल प्रतिदिन है जिसमें से करीब 25 से 27 लाख बैरल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है. एसएंडपी ने कहा कि इस मार्ग पर उच्च निर्भरता के बावजूद भारत के पास सीमित भंडार है. देश का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार लगभग 10 दिन की खपत के लिए पर्याप्त है, जबकि वाणिज्यिक भंडार करीब 65 दिन के लिए पर्याप्त हो सकता है. एलपीजी और एलएनजी के भंडार इससे भी कम हैं.
नुकसान की आशंका क्यों
रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती कीमतें एवं सरकारी निर्देश तेल कंपनियों के मुनाफे को कम कर सकते हैं. हालांकि, ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) पर जोखिम कम होगा क्योंकि ऊंची कीमतों से उनकी बिक्री बढ़ती है और उनका पश्चिम एशिया से परिचालन जोखिम सीमित है. लेकिन, तेल विपणन कंपनियों को बाजार और नियामकीय दोनों प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. भारत में उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी की कीमतें नियंत्रित हैं. बढ़ती कीमतों के बीच आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल को महंगाई पर काबू रखने के लिए पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें स्थिर रखनी पड़ सकती हैं. इससे उनके ‘मार्जिन’ पर असर पड़ सकता है.
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प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्वेस्टमेंट टिप्स, टैक्स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…और पढ़ें
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