इस समझौते के बाद यूरोप से आने वाली लग्जरी कारें जैसे BMW, Mercedes और Audi काफी सस्ती हो जाएंगी. अब तक इन पर लगने वाला भारी टैक्स भारतीय कंपनियों (जैसे टाटा और महिंद्रा) के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता था. टैक्स कम होने से जब विदेशी कारें भारतीय बाजार में अपनी पैठ बढ़ाएंगी, तो घरेलू निर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा बहुत कठिन हो जाएगी. एक रिसर्च के मुताबिक, ऑटोमोबाइल सेक्टर में ईयू की हिस्सेदारी 26% से बढ़कर 83% तक पहुंच सकती है, जबकि भारत की पहुंच वहां केवल 1.3% रह जाने का अनुमान है.
महंगी हो सकती हैं दवाएं
भारत को सस्ती जेनेरिक दवाओं के लिए ‘दुनिया की फार्मेसी’ माना जाता है. लेकिन यूरोपीय संघ के सख्त इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) नियम भारत के लिए बड़ी अड़चन बन सकते हैं. इन नियमों के तहत दवाओं के पेटेंट की अवधि बढ़ सकती है, जिसका मतलब है कि भारतीय कंपनियां नई और जीवनरक्षक दवाओं के सस्ते ‘जेनेरिक वर्जन’ जल्दी बाजार में नहीं ला पाएंगी. विशेषज्ञों का डर है कि इससे कैंसर, एड्स और डायबिटीज जैसी बीमारियों की दवाएं कई गुना महंगी हो सकती हैं, जो गरीब मरीजों के लिए एक बड़ा झटका होगा.
CBAM और पर्यावरण टैक्स की मार
यूरोपीय संघ ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) नामक एक नया नियम बनाया है. इसके तहत यदि भारत का स्टील, एल्युमिनियम या सीमेंट अधिक प्रदूषण फैलाने वाली पुरानी तकनीक से बनाया गया है, तो उस पर ईयू में प्रवेश करते ही ‘एक्स्ट्रा कार्बन टैक्स’ लगेगा. यह टैक्स एफटीए से मिलने वाले फायदों को काफी हद तक कम कर सकता है. विशेष रूप से हमारे सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSMEs) के लिए इन नए और महंगे पर्यावरण मानकों को अपनाना एक बड़ी वित्तीय चुनौती होगी.
छोटी फैक्ट्रियों और नौकरियों पर असर
जब यूरोप से मशीनरी और केमिकल्स सस्ती दरों पर भारत आएंगे, तो स्थानीय स्तर पर काम करने वाली छोटी फैक्ट्रियों (SMEs) के लिए चुनौतियां बढ सकती हैं. कई क्षेत्रों में यूरोपीय सामानों की भरमार घरेलू उत्पादन को धीमा कर सकती है, जिसकी आंच कुछ नौकरियों पर आ सकती है. इसके अलावा, ईयू के कड़े ‘लेबर स्टैंडर्ड्स’ का पालन करना भारतीय उत्पादकों के लिए उत्पादन लागत बढ़ाने वाला साबित हो सकता है.
संतुलन की जरूरत
निश्चित रूप से, यह समझौता भारत के निर्यात को नई ऊंचाइयां देगा और नई तकनीक लाएगा, लेकिन उपरोक्त चुनौतियां भी वास्तविक हैं. सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह अपने घरेलू उद्योगों, विशेषकर फार्मेसी और ऑटो सेक्टर को इन संभावित झटकों से बचाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय (Safeguards) प्रदान करे.
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