मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, शेयर बाजार हमेशा भविष्य की संभावनाओं पर चलता है. 2007 से अटकी इस डील का अंतिम चरण में पहुंचना निवेशकों के लिए एक बड़ा भरोसा है. एलारा कैपिटल के विशेषज्ञों के अनुसार, यह 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद भारत का सबसे बड़ा ‘सुधार आंदोलन’ हो सकता है. बाजार अब तक इस बदलाव को कम आंक रहा है, लेकिन जैसे ही समझौते की औपचारिक घोषणा होगी, टेक्सटाइल, सर्विसेज, बैंकिंग, लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टरों में तेज लिवाली देखने को मिल सकती है.
भारत और यूरोपीय संघ के बीच कितना है व्यापार?
भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक संबंध पहले से ही काफी गहरे हैं. जेफरीज की इक्विटी स्ट्रैटेजी रिपोर्ट के अनुसार, दोनों क्षेत्रों के बीच सालाना वस्तु व्यापार (Goods Trade) लगभग 130 अरब डॉलर का है. यह भारत के अमेरिका या चीन के साथ होने वाले व्यापार के बराबर खड़ा है. 2025 के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत ने यूरोपीय संघ को 75 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि आयात 65 अरब डॉलर का रहा.
यह 10-15 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस भारत की आर्थिक मजबूती को दर्शाता है. पेट्रोलियम उत्पादों और इलेक्ट्रॉनिक्स शिपमेंट में हुई बढ़ोतरी ने इस सरप्लस को बनाए रखने में मदद की है. इसके अतिरिक्त, सेवाओं का व्यापार भी 72 अरब डॉलर के करीब है, जिसमें भारत 9 अरब डॉलर के लाभ की स्थिति में है. एफटीए होने के बाद इन आंकड़ों में 20 से 30 प्रतिशत की और बढ़ोतरी होने की संभावना है, जो सीधे तौर पर भारतीय कंपनियों की बैलेंस शीट और शेयर बाजार के मूल्यांकन (Valuation) को प्रभावित करेगा.
शेयर बाजार पर असर
अमेरिका में बढ़ते टैरिफ और व्यापारिक चुनौतियों के बीच यूरोपीय संघ भारत के लिए एक ठोस ‘वैकल्पिक बाजार’ के रूप में उभर रहा है. ओम्नीसाइंस कैपिटल के संस्थापक और सीईओ विकास गुप्ता ने कहा, “ईयू–भारत एफटीए पर बाजारों की प्रतिक्रिया सकारात्मक होनी चाहिए. भारतीय कंपनियों के लिए यह अमेरिका का एक बड़ा वैकल्पिक बाजार बन सकता है, जहां अब ऊंचे टैरिफ के कारण चुनौतियां बढ़ रही हैं.” एलारा कैपिटल के हरेंद्र कुमार ने कहा कि बाजारों के लिए असली कहानी भारत की एफटीए को लेकर आक्रामक रणनीति में छिपी है, जो 1990 के दशक के बाद से देश का सबसे बड़ा सुधार आंदोलन है. उन्होंने कहा, “भारत अपनी भू-आर्थिक (जियो-इकोनॉमिक) रणनीति को मूल रूप से बदल रहा है. बाजार खोल रहा है, व्यापार बाधाएं घटा रहा है और दो-तरफा व्यापार को बढ़ावा दे रहा है. बाजार इस बदलाव को कम आंक रहे हैं.”
किन सेक्टर्स को एफटीए से ज्यादा फायदा?
जेफरीज के अनुसार, टेक्सटाइल और परिधान सेक्टर सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल हो सकते हैं. यूरोपीय संघ हर साल करीब 125 अरब डॉलर के टेक्सटाइल और अपैरल का आयात करता है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी केवल 5–6 प्रतिशत है, जबकि चीन की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत है. भारतीय निर्यातकों को फिलहाल 10 प्रतिशत तक टैरिफ देना पड़ता है, जबकि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों को जीरो-ड्यूटी एक्सेस मिलता है. एफटीए से यह असमानता दूर हो सकती है. फार्मास्युटिकल्स के मामले में ईयू टैरिफ पहले से ही लगभग शून्य हैं, लेकिन जेफरीज का कहना है कि कंप्लायंस नियमों में ढील भारतीय दवा कंपनियों के लिए एक बड़ा सकारात्मक ट्रिगर साबित हो सकती है.
विकास गुप्ता का मानना है कि कई सेगमेंट्स में फायदा देखने को मिल सकता है. उन्होंने कहा, “हाई-एंड सेगमेंट में प्रोफेशनल सर्विसेज, जैसे आईटी और कंसल्टिंग, साथ ही इंजीनियर्ड गुड्स और इंडस्ट्रियल सेक्टर को सकारात्मक असर मिल सकता है. फार्मा और हेल्थकेयर सेक्टर पर भी इसका अच्छा प्रभाव पड़ने की संभावना है.” गुप्ता ने आगे कहा, “मिड-एंड सेगमेंट में ब्रांडेड और व्हाइट-लेबल अपैरल, फुटवियर, मरीन प्रोडक्ट्स और अन्य श्रम-प्रधान सेक्टरों को भी लाभ मिल सकता है.”
ऑटो सेक्टर के लिए यह समझौता मिला-जुला रह सकता है. जहां ईयू आयात शुल्क घटाने पर जोर दे रहा है, वहीं भारतीय ऑटो कंपनियों को यूरोपीय लक्जरी कारों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि, कलपुर्जा निर्माताओं (Auto Ancillary) के लिए निर्यात के नए रास्ते खुलेंगे. एविएशन सेक्टर में विमानों और पुर्जों पर 2.5 से 10 प्रतिशत की कस्टम ड्यूटी लगती है. इस ड्यूटी में कटौती होने से इंडिगो और एयर इंडिया जैसी कंपनियों की इनपुट लागत कम होगी.
ईयू की क्या है भारत से उम्मीद?
यूरोपीय संघ के लिए भारत केवल एक बाजार नहीं, बल्कि ‘चीन+1’ रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यूरोपीय संघ से उम्मीद की जा रही है कि वह लग्जरी कारों, शराब, फैशन ब्रांड्स और हाई-एंड मशीनरी के लिए बेहतर बाजार पहुंच की मांग करेगा. साथ ही, चीन पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के तहत भारत को एक वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग बेस के रूप में पेश करेगा.
भारत की बड़ी जीत
भारत-ईयू एफटीए अगर सिरे चढता है तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ‘रणनीतिक जीत’ की तरह है. यह समझौता भारत को वैश्विक व्यापार मंच पर एक विश्वसनीय और मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा. शेयर बाजार के नजरिए से, यह उन निवेशकों के लिए एक सुनहरा मौका है जो टेक्सटाइल, फार्मा, आईटी और ऑटो कंपोनेंट सेक्टर में लंबी अवधि के लिए निवेश करना चाहते हैं.
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