नई दिल्ली. भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच 26-27 जनवरी 2026 को हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) दशकों की मेहनत के बाद एक बड़ी ऐतिहासिक जीत है. हालांकि, शेयर बाजार और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत के लिए ‘विकल्प’ (Diversification) तो है, लेकिन यह अमेरिका के साथ होने वाले संभावित व्यापार समझौते की जगह नहीं ले सकता. अमेरिका अब भी भारतीय निर्यातकों के लिए कमाई और बाजार गहराई (Market Depth) के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बना हुआ है.
हालांकि, बाजार के जानकारों ने एक ‘रियलिटी चेक’ भी दिया है. उनका कहना है कि यूरोपीय संघ के साथ समझौता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन भारतीय कंपनियों के मुनाफे और शेयर बाजार की चाल तय करने में वाशिंगटन (अमेरिका) का वजन ब्रुसेल्स (EU) से कहीं ज्यादा है. अमेरिका के साथ भारत का व्यापार सरप्लस $45 बिलियन है, जबकि EU के साथ यह $25 बिलियन के करीब है. इसलिए, निवेशक इस डील को एक पूरक (Complementary) के तौर पर देख रहे हैं, न कि अमेरिका के विकल्प के रूप में.
भारत-EU व्यापार समझौते के मुख्य आंकड़े
- सालाना द्विपक्षीय व्यापार: करीब $135 बिलियन (माल और सेवाएं).
- टैरिफ में कटौती: 90–95% व्यापारिक वस्तुओं पर आयात शुल्क चरणबद्ध तरीके से खत्म होगा.
- लागू होने का समय: यह समझौता पूरी तरह से 2027 की शुरुआत तक प्रभावी होने की उम्मीद है.
- लाभार्थी क्षेत्र: कपड़ा, परिधान, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न और आभूषण, इंजीनियरिंग सामान और ऑटोमोबाइल.
विशेषज्ञों का नजरिया: अमेरिका बनाम यूरोप
विशेषज्ञों के अनुसार, दलाल स्ट्रीट के लिए अमेरिका संरचनात्मक रूप से अधिक महत्वपूर्ण बना रहेगा क्योंकि:
- कमाई की तीव्रता (Earnings Intensity): आईटी सर्विसेज, फार्मा और स्पेशलिटी केमिकल्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों के लिए अमेरिकी बाजार में मांग और मुनाफे की दर (Pricing Power) यूरोप से बेहतर है.
- बाजार का प्रभाव: वीके विजयकुमार (जियोजित इन्वेस्टमेंट्स) का मानना है कि EU डील एक बड़ा ब्रेकथ्रू है, लेकिन इसे अमेरिका का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए. अमेरिका के साथ व्यापार में प्रगति होने पर बाजार में अधिक निर्णायक तेजी (Rally) देखने को मिलती है.
- हेजिंग का साधन: विकास गुप्ता (ओमनीसाइंस कैपिटल) के अनुसार, यह डील उन उत्पादों के लिए वैकल्पिक बाजार (Hedge) प्रदान करती है जिन्हें अमेरिका में टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन यह अमेरिकी बाजार की गहराई की बराबरी नहीं कर सकती.
शेयर बाजार पर असर
समझौते के बाद ऑटोमोबाइल और लग्जरी गुड्स से जुड़ी कंपनियों में कुछ दबाव देखा गया क्योंकि यूरोप से आने वाली कारों और प्रीमियम सामानों पर टैरिफ कम होने से घरेलू कंपनियों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा. हालांकि, लंबी अवधि में यह समझौता भारत के “चीन-प्लस-वन” (China-plus-one) थीम को मजबूत करेगा और निर्यात-उन्मुख विनिर्माण (Export-oriented manufacturing) को नई ऊर्जा देगा.
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जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
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