उद्योग जगत के दिग्गजों का मानना है कि यह समझौता भारत की वैश्विक एकीकरण की प्रक्रिया को और गहरा करेगा. रेसिप्रोकल टैरिफ का 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत होना केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को सीधे तौर पर बढ़ाने वाला कदम है. इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) का भरोसा भी मजबूत होगा, जिससे शेयर बाजार और रुपये की स्थिति में स्थिरता आएगी.
भरोसे की नई नींव
महिंद्रा ग्रुप के प्रमुख अनीश शाह ने इस डील का स्वागत करते हुए कहा कि भारतीय निर्यात पर टैरिफ में 50% से 18% की तत्काल कटौती विकास की गति को तेज करेगी. उनके अनुसार, यह फैसला उन व्यवसायों को जरूरी ‘प्रेडिक्टेबिलिटी’ (पूर्वानुमान) प्रदान करेगा जिन्हें आत्मविश्वास के साथ निवेश करने की आवश्यकता होती है. यह डील भारत की विकास महत्वाकांक्षाओं को सार्थक गति प्रदान करती है और दीर्घकालिक पूंजी आवंटन में सहायक होगी.
निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार
सुदर्शन वेणु ने टैरिफ में इस कमी को एक सकारात्मक कदम बताया है. उनका मानना है कि इससे न केवल निर्यात की स्थिति बेहतर होगी, बल्कि यह दीर्घकालिक द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों में विश्वास को भी पुख्ता करेगा. यह समझौता प्रधानमंत्री मोदी के ‘विकसित भारत 2047’ के दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो भारतीय विनिर्माण को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाता है.
गेम चेंजर साबित होगी डील
भारत फोर्ज के बाबा कल्याणी ने इसे भारतीय उद्योग के लिए ‘गेम चेंजर’ करार दिया है. उनके अनुसार, यह वैश्विक सप्लाई चेन, विशेष रूप से ऑटोमोटिव, एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर में भारत की स्थिति को बहुत मजबूत करेगा. इस समझौते से कंपनियों को अपनी उत्पादन क्षमताओं का विस्तार करने का जरूरी आत्मविश्वास मिलेगा.
वित्तीय स्थिरता का आधार
वित्तीय सेवा क्षेत्र के नजरिए से जॉर्ज अलेक्जेंडर मुथूट ने कहा कि ऐसी नीतिगत स्पष्टता विवेकपूर्ण पूंजी नियोजन का समर्थन करती है. यह निरंतर विकास के लिए एक स्थिर वातावरण तैयार करती है, जो बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों के लिए बेहद जरूरी है.
कॉर्पोरेट जगत का सामान्य रुख
भारतीय उद्योग जगत के अन्य नेताओं का भी यही मानना है कि यह डील वैश्विक मंच पर भारत की विश्वसनीयता को और बढ़ाती है. यह केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं बल्कि नीतिगत निरंतरता का एक प्रतीक है. इससे विनिर्माण और नवाचार के क्षेत्र में भारत की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी, जिससे एफडीआई (FDI) प्रवाह में भी तेजी आने की उम्मीद है.
बाजार और निवेश पर प्रभाव
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस डील के बाद निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों जैसे टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग सामान, फार्मा और ऑटोमोबाइल के मूल्यांकन (Valuations) में सुधार होगा. टैरिफ बाधाओं और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने की प्रतिबद्धता से भारत एक परिपक्व वैश्विक वाणिज्य खिलाड़ी के रूप में उभरेगा.
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