इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत पिछले तीन महीनों से अंतिम चरण में है. उन्होंने बताया कि अब दोनों पक्ष समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके हैं और 24 में से 20 चैप्टर पर सहमति बन चुकी है. अग्रवाल के मुताबिक कुछ मुद्दों पर अभी बातचीत जारी है और दोनों टीमें रोज़ाना वर्चुअल तौर पर संपर्क में हैं. उन्होंने कहा कि कोशिश है कि नेताओं की बैठक से पहले तय समयसीमा के भीतर समझौते को अंतिम रूप दिया जा सके.
भारत-EU डील पर जल्द बन सकती है बात
भारत-EU ट्रेड डील इतिहास के सबसे बड़े व्यापार समझौतों में शामिल हो सकती है. अमेरिका की बदलती और सख्त ट्रेड नीतियों के बीच इस समझौते को लेकर दोनों पक्षों में तेजी दिख रही है. भारत ने साल 2025 में पहले ही तीन बड़े ट्रेड एग्रीमेंट किए हैं, जबकि यूरोपीय संघ ने हाल ही में दक्षिण अमेरिका के मर्कोसुर ट्रेड ब्लॉक के साथ लंबे समय से लंबित समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. जब भारत-EU डील पर हस्ताक्षर होंगे और इसे लागू किया जाएगा, तो यह भारत के लिए अब तक के सबसे बड़े व्यापार समझौतों में से एक होगी. इससे अमेरिका के हाई टैरिफ का असर कुछ हद तक कम होगा और EU बाजार में भारत के श्रम-प्रधान उत्पादों(labour intensive) के लिए नए अवसर खुलेंगे.
कृषि क्षेत्र को नहीं किया शामिल
सरकार के एक अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया है कि दोनों पक्षों से जुड़े संवेदनशील कृषि मुद्दों को इस समझौते से बाहर रखा गया है. यह बयान उन खबरों के जवाब में दिया गया है, जिनमें कहा गया था कि कृषि क्षेत्र को ट्रेड डील में शामिल नहीं किया गया है. यूरोपीय न्यूज़ वेबसाइट Euractiv की रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने यूरोपीय संसद के सदस्यों के साथ बंद कमरे की बैठक में कहा है कि यूरोपीय संघ इस महीने भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने की तैयारी में है. इस प्रस्तावित समझौते में कृषि क्षेत्र को शामिल नहीं किया गया है. कृषि भारत के लिए हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है और यही वजह है कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील में भी यह बड़ा अड़चन बना हुआ है. अमेरिका लगातार भारत पर जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) उत्पादों, जैसे मक्का और सोयाबीन, को खरीदने का दबाव बना रहा है.
कुछ अहम मुद्दों की वजह से बिगड़ी बात
कृषि यूरोपीय संघ के लिए भी चिंता का विषय है. Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस में किसानों ने हाल ही में EU–मर्कोसुर ट्रेड डील के विरोध में पेरिस में ट्रैक्टर रैली निकाली. किसानों का कहना है कि इस समझौते से सस्ते दक्षिण अमेरिकी कृषि उत्पादों के कारण स्थानीय किसानों को नुकसान होगा और प्रतिस्पर्धा असमान हो जाएगी. भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच ट्रेड डील पर बातचीत में कुछ अहम मुद्दों की वजह से अड़चनें आई हैं. इनमें कार्बन टैक्स, व्हिस्की और ऑटोमोबाइल सेक्टर सबसे संवेदनशील रहे हैं. EU का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल निर्यातक देश जर्मनी, भारत में अपने वाहनों के लिए ज्यादा बाजार पहुंच चाहता है. वहीं भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर भी तेजी से बढ़ रहा है और यह देश में रोजगार देने वाले बड़े क्षेत्रों में से एक है, इसलिए सरकार इसमें संतुलन बनाए रखना चाहती है.
कार्बन टैक्स है चुनौती
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती कार्बन टैक्स को लेकर है. अगर धातुओं के निर्यात पर ज्यादा कार्बन ड्यूटी लगती है, तो ट्रेड डील से मिलने वाले फायदे कम हो सकते हैं या खत्म भी हो सकते हैं. यूरोपीय संघ ने 1 जनवरी से दुनिया का पहला कार्बन टैक्स लागू करना शुरू कर दिया है. मौजूदा व्यवस्था के तहत CBAM (कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म) उन देशों से आने वाले सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगाएगा, जहां पर्यावरण नियम EU की तुलना में कमजोर हैं. इसमें बिजली क्षेत्र और ज्यादा ऊर्जा खपत वाले उद्योगों के उत्पाद शामिल हैं, जैसे सीमेंट, स्टील, एल्यूमिनियम, तेल रिफाइनरी उत्पाद, कागज, कांच, केमिकल और उर्वरक.
हालांकि CBAM के मौजूदा दायरे में कुछ ही सेक्टर शामिल हैं, लेकिन इसमें EU के सांसदों को यह अधिकार दिया गया है कि वे भविष्य में टैक्स लगने वाले उत्पादों की सूची बढ़ा सकते हैं. भारत मुख्य रूप से EU को एल्यूमिनियम, लोहा और स्टील का निर्यात करता है, और इस नियम के चलते इन पर असर पड़ने की आशंका है.
EU के ट्रेड कमिश्नर से हुई पीयूष गोयल की मुलाकात
अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर बनी अनिश्चितता ने भारत को नए बाजारों की ओर तेजी से देखने पर मजबूर किया है. नवंबर में कॉमर्स और इंडस्ट्री मंत्रालय ने ट्रेड डील पर काम कर रहे वकीलों से छुट्टी न लेने तक को कहा था, ताकि बातचीत में तेजी लाई जा सके. पिछले कुछ महीनों में कई उच्चस्तरीय बैठकें हुई हैं, जिनमें कॉमर्स और इंडस्ट्री मंत्री पीयूष गोयल ने EU के ट्रेड कमिश्नर मारोश शेफचोविच से मुलाकात की है.
इस बीच भारतीय निर्यातक अमेरिका के टैरिफ की वजह से ऑर्डर घटने को लेकर चिंतित हैं. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय परिधान निर्माताओं और अमेरिकी आयातकों के बीच गर्मियों के सीजन के करीब 2 अरब डॉलर के ऑर्डर पर बातचीत अटक गई है. निर्यातकों का कहना है कि अगर ट्रेड डील नहीं होती है, तो गर्मियों के ज्यादातर ऑर्डर बांग्लादेश, वियतनाम और यहां तक कि चीन जैसे देशों की ओर जा सकते हैं, जहां भारत की तुलना में कम टैरिफ लागू हैं. इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक कुछ ऑर्डर पहले ही दूसरे देशों में शिफ्ट हो चुके हैं, और अगर इस सीजन के ऑर्डर हाथ से निकल गए तो इसका असर लंबे समय तक पड़ सकता है.
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